15/09/2026
मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आते हैं, मगर मनमर्ज़ी से! कहीं हम भी “فَوَيْلٌ لِّلْمُصَلِّينَ” में तो नहीं?
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कुछ लोग मस्जिद में नमाज़ के लिए आते तो हैं, लेकिन अपनी मर्ज़ी और सुविधा के मुताबिक़—जब दिल किया आ गए, जब मन नहीं किया तो नमाज़ छोड़ दी। सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ कभी-कभी मस्जिद आ जाना ही काफी है?
क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया: “فَوَيْلٌ لِّلْمُصَلِّينَ” — “पस उन नमाज़ पढ़ने वालों के लिए हलाकत है।”
यह आयत हमें झकझोर कर सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर किन नमाज़ियों के लिए यह चेतावनी है?
इस बयान में नमाज़ की पाबंदी, मस्जिद से लगाव, नमाज़ में लापरवाही और अल्लाह के सामने अपनी ज़िम्मेदारी को समझने की अहमियत पर महत्वपूर्ण बात की गई है।
अगर हम नमाज़ पढ़ते हैं, तो हमें अपनी नमाज़ और उसके रवैये का भी जायज़ा लेना चाहिए।
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