Punam sachan

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30/10/2025

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10/11/2024

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जिसको तुम चाहो वो मोहब्बत,
और जो तुम्हे चाहे उसका क्या?

जिसके लिये तुम रोये वो मोहब्बत,
जो तुम्हारे लिये रोया उसका क्या?

जिसके लिये तुम तडपे वो मोहब्बत,
जो तुम्हारे लिये तडपा उसका क्या?

जिसको तुमने चाहा वो तुमको मिला,
और जिसको तुम ना मीले उसका क्या?

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10/11/2024

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चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया.

दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.”

पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा. कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें. ‘रजत’ पुकारा करें. अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं. समाज में मेरा एक अलग रुतबा है. ऊंचा क़द है, मान-सम्मान है. बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा. मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है. मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं. मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था. भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न.”
“हां हां बैठ गए हैं. गाड़ी भी चल पड़ी है.” “देखो, पापा का ख़्याल रखना. रात में मेडिसिन दे देना. भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना. पापा को वहां कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”

“नहीं होगी.” मैंने फोन काट दिया. “रितु का फोन था न. मेरी चिंता कर रही होगी.”
पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था. रात में खाना खाकर पापा सो गए. थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया. तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी.
एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था. हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी. हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी. शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी. कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया. मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया.

दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा. कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे. बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था. यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया. पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर.” मैं सकपका गया. फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई. इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था. वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था. उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया. यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया. कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा. हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह…

पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध मां को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया. एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं. तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं.” मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”
“ठीक हूं सर.”
“कोटा कैसे आना हुआ?”
“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था. अब मुंबई जा रहा हूं. शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था.”
“छोटा भाई, हां याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.
“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं. आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं. आपको कहां याद होगा? देवेश नाम है उसका सर.”

पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई. उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो. हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”
“हां रजत, उसने वहां मकान ख़रीदा है. दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है.
चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे.”
“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?” “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी. इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरतीं न.”
“हां, यह तो है. पिताजी कैसे हैं?”

“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था. अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं. अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है.”
“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा. क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे.” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था. आशा के विपरीत रमाशंकर बोला, “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं. उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है. मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए. कभी इधर, तो कभी उधर. कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा. वह हम पर बोझ हैं.”

मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए. जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है. अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे.”
“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूं. मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है. कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए. मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं. समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए.”

मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो. मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी. रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं. इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था. प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका. क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है. नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है.

आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए. जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी. रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए. मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं. दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी. सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं.
एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पांव ठिठक गए. मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी. कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं.”
“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है. कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूं. रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता.”

इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं. कितने टूट गए थे पापा. बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा. यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी. उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए. अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएं? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है. छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे. पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर. चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं. उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी. सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी. सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी सांस ली.

आंखों से बह रहे पश्‍चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे. उफ्… यह क्या कर दिया मैंने. पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया. आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी. क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था. उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.

गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुंचा. उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूं. यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा.” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया.
आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था. मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे.”
“आऊंगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है.” ख़ुशी से उसकी आवाज़ कांप रही थी. अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया. स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा. पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए. हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं. अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे.” पापा की आंखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा.
“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे.” वह बुदबुदाए. कुछ पल के लिए उन्होंन अपनी आंखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा. मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला.

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01/11/2024

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अपने बदले हुए हालात देख-देखकर बिन्नो की बार-बार रुलाई फूट रही थी. देखते ही देखते क्या-क्या हो गया था. मायके में उसकी खिलखिलाती हंसी, वो चुलबुलापन, चहचहाना और वह बचपना
सब कुछ एक ही झटके में ख़त्म सा हो गया. लेकिन उसने तो न जाने कितने सपने संजोए थे. और क्या-क्या सपने दिखाये थे‌ उसकी सहेलियों ने, उसके घरवालों ने और मिलनेवालों ने, जिसे देखो वह यही कहता था- "तेरे तो ऐश हो गए बिन्नो!"
"अरे, मांग कर लड़की ले जा रहे हैं… राज करेगी राज अपने घर में." नानी की यह आवाज़ उसके कानों में अभी तक गूंज रही थी.
विदाई के बाद जब वह ससुराल पहुंची, तो वहां की रस्म वगैरह निबटते-निबटते रात के एक बज गए. थकी-हारी बिन्नो इसी प्रतीक्षा में थी कि कोई आकर उससे कहेगा कि जा कर सो जाओ. थोड़ी देर बाद उसकी सास आई और बोली, "जा सो जा बिन्नो, रात बहुत हो गई है…" बिन्नो को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई, पर अपनी सास की आगे की बात सुन कर उसे लगा कि उसका यह सुख तो क्षणिक ही था.
"… और फिर सवेरे तुझे जल्दी भी हो उठना है. देख, संजू के बाबा-दादी को सुबह चार बजे उठने की आदत है. उन्हें उठते ही चाय चाहिए होती है. वे लोग तेरे हाथ की चाय पीने की ज़िद कर रहे हैं."
अपने कमरे में आई तो संजू गहरी नींद में सो चुका था. बिन्नो बिना कोई आहट किए उसके बगल में लेट गई. दिनभर सिर झुकाए बैठे रहने की वजह से उसकी गर्दन दुख रही थी. लेटते ही पलके झपकने लगीं.
"उठ बिन्नो! नौ बज गए, कब तक सोती रहेगी? दो बार चाय रख कर गई. दोनों बार ठंडी हो गई." दीदी ने उसे झिंझोड़ दिया था.
"अरे, सोने दे न बेचारी को. आज कौन सा कॉलेज जाना है." पापा की प्यार भरी आवाज़ आई, जिसने एक मीठी लोरी का काम किया और बिन्नो चादर मुंह तक ओढ़कर और गहरी नींद में सो गई. उसने दीदी की बात पर कोई ध्यान न दिया.
"सो ले लाडो, जब ससुराल में सास की झिड़की पड़ेगी, तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी." दीदी मुस्कुराती हुई चली गई.
मायके में थी तो वहां कोई भी उसे आठ-नौ बजे से पहले नहीं उठाता था. घर में सबसे छोटी होने के कारण कोई काम भी नहीं करना पड़ता था. यहां तो चाय भी उसे ही बनानी पड़ेगी, वह भी सुबह तीन बजे उठ कर. घर में इतने नौकर-चाकर हैं, फिर भी उसे ही कहा गया.
अतीत की बातों को याद करते-करते न जाने कब सो गई वह. आंसू ढुलककर उसके गालों पर आ गए और सूख कर अपना निशान छोड़ गए.
दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक से उसकी आंख खुल गई… ठीक तीन बजे थे. दरवाज़ा खोला तो सामने सास खड़ी थी. बिना कुछ बोले वह चली गईं. कितना कठोर लग रहा था उनका चेहरा. उसे मां याद आ गई. उसका रोना फूट पड़ा. दिनभर में यही तो एक समय था जब उसे रोने को मिल सकता था. सारे दिन तो उसको देखनेवालों का तांता लगा रहता था. जी हल्का होने पर उसने वॉशबेसिन में जाकर अपना मुंह धोया. पानी के साथ आंसू भी बह गए. ससुराल में उसका एक और दिन शुरू होने जा रहा था.

पिछले चार दिनों में बिन्नो का बुरा हाल हो गया था. सिर झुकाए बैठे-बैठे… चारों तरफ़ तमाम औरतों का जमघट अपनी कचर-पचर लगाए रहता था. सबेरे से ही उसे नहा-धोकर तैयार हो जाना होता था. बैठक में ज़मीन पर दरी और उस पर गद्दे और तकिए बिछा दिए गए थे. सारी बिरादरी और मुहल्ले की औरतें उसके चारों ओर बैठा दी जातीं. सब की सब उसे ऐसे देखती-परखती थीं, मानो बायोलॉजी के क्लास में इकलौते कटे हुए मेंढक को देखने पूरी क्लास जुटी हो. बिन्नो, कटे हुए मेंढक की तरह, बिना हिले-डुले, बीच में सिर झुकाए बैठी रहती. एक-एक करके सभी औरतों की बारी आती, तो वह बिन्नो के पास आकर उसका घूंघट उठा कर उसे देखती और रुपए पकड़ा जाती. बिन्नो रुपए लेकर उनके पैर छूती और रुपए बगल में बैठी अपनी ननद मंजू को पकड़ा देती.
एक दिन दोपहर में सारे मेहमानों के जाने के बाद मंजू बोली, "चलो भाभी, कमरे में चल के ज़रा आराम कर लो." कमरे में आए पांच मिनट भी नहीं हुए होंगे कि नीचे से किसी महिला की बड़ी ज़ो-ज़ोर की आवाज़ें आने लगी, "अरे बहनजी, माफ़ करना, आने में थोड़ी सी देर हो गई, पर हम क्या इतने गैर हो गए कि हमारा दो मिनट इंतज़ार भी नहीं किया गया. बहू को बिना हमारे देखे ही छुपा दिया, कोई खोटवाली लड़की तो नहीं ले आई."
अच्छा-ख़ासा हंगामा खड़ा हो गया. तब तुरंत उसकी सास ने ताकीद कर दी कि बिना उनकी इजाज़त के बहू अपने कमरे में नहीं जाएगी. अच्छा नहीं लगता कि उसे देखनेवालों को बेवजह इंतज़ार करना पड़े.
मायके में इतनी लाड़ली थी सबकी कि उसके कहीं भी आने-जाने पर किसी की भी रोक-टोक नहीं थी. मस्त तितली की तरह उड़ती-फिरती थी वह सब जगह और यहां… अपने कमरे में जाने के लिए भी सास की आज्ञा की आवश्यकता है. तितली के पर काटने पर उसे कैसी तकलीफ़ होती होगी, अब पता चला बिन्नो को.
पड़ोस की चक्की ताई अगले दिन आई थीं. ५-६ औरतों के बाद उनका नम्बर आया. जैसे ही उन्होंने बिन्नो का घूंघट हटाया, अपनी कांय-कांय बाली आवाज़ में बिन्नो की सास को उमेठना शुरू कर विया, "अरे वाह! हमको तो पता ही न था कि मुंह दिखाई में मुंह के अलावा भी कुछ देखना है. यह ती यहां सब कुछ उड़ेले बैठी है. हम बुढ़ियों को ही बुलाना था तो इत्ते खुले गले का ब्लाउज़ पहनाने की क्या ज़रूरत थी?" फिर बुआ सास की ओर मुंह करके बोली, "इसे ज़रा कंट्रोल में रखना, यह तुम सबको उंगली पर न नचा दे."
बिन्नो बहुत घबरा गई, उसे उम्मीद थी कि घर का कोई सदस्य उसकी तरफ़ से बोलेगा, पर कोई कुछ न बोला.
अगले दिन सवेरे कमरे का दरवाज़ा खोला बुआजी और उनके पीछे बिन्नो की सास खड़ी थीं. दोनों धडधडाती हुई कमरे के अन्दर आ गई.
"बिन्नो, तुम्हारे पास कोई ऊंचे गले का ब्लाउज़ नहीं है?" बिन्नो की बुआ सास उसकी आलमारी पर नज़र मारते हुए बोली.
"है बुआजी, एक वो साड़ियों के साथ है."
"ठीक है, तो आज वही पहनकर नीचे बैठक में आओ." कहते हुए बुआजी ने कड़ी नज़र से संजू की मां की ओर देखा मानो कह रही हो कि तुम भी तो कुछ डांटो.

बिन्नो की सास ने आदेश पारित किया, "और आगे से भी ध्यान रखना कि ब्लाउज़ ऊंचे गले वाली और ढकी हुई हो." सासजी बिन्नो को आदेश देकर अपना कठोर चेहरा लेकर नीचे चली गईं. बिन्नो डबडबाई आंखों के धुंधलेपन में अपनी साड़ी-ब्लाउज़ टटोलने लगी.
"दादी, मैं अपनी जींस-स्कर्ट वगैरह भी रख लूं." शादी के समय अपने सामान की पैकिंग करते समय पूछा था बिन्नो ने. जवाब नानी ने दिया था, "वह लोग कह गए हैं कि तुझे बिल्कुल अपनी बेटी की तरह रखेंगे, जैसी मंजू वैसी ही तू. मंजू तो यह सब पहनती है और वह तो तुझ से तीन साल बड़ी भी है. ले जा, साड़ी की तुझे आदत ही कहां है." वाकई साड़ी तो उसने एक ही बार पहनी थी… सारी सहेलियों ने तय किया था कि दीदी की शादी में सब साड़ियां ही पहनेगी. साड़ी पहन कर जब वह बाहर निकली थी, तो सबने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी.
उसके पापा तो उसे देखते ही रह गए थे. नानी से बोले थे, "देखो मां, कितनी बड़ी लग रही है अपनी बिन्नो, बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती है."
सबकी आंखों में आंसू आ गए थे. बिन्नो ने तुरन्त जाकर शीशे में स्वयं को निहारा और दीवार पर टंगी हुई मां की तस्वीर से अपना मिलान करने लगी. पापा सही कह रहे थे, अगर वह साड़ी पहने हुए अपनी फोटो मां की फोटो के बगल में लगा दे, तो दोनों एक सी लगेगी. अन्तर केवल एक ही होगा कि मां की फोटो पर माला टंगी थी.
दीदी की जयमाल के समय जब वह दीदी के साथ चल कर मंच तक आई, तो संजू की नज़र उस पर ठहर सी गई. सुना है घर जा कर उसने ज़िद पकड़ ली कि वह शादी करेगा, तो बिन्नो से ही. तब संजू के मां-बाप बिन्नो के घर रिश्ता लेकर आए थे.
बिन्नो के पापा ने उन्हें समझाने की कोशिश की, "हमारे अहोभाग्य जो आप लोग हमारे घर तक आए, पर लड़की तो अभी ग्यारहवीं में ही पढ़ रही है, अभी बहुत छोटी है."
बिन्नो की सास ने उनकी बात काटी, "हमारे बेटे ने आज तक जिस खिलौने पर भी हाथ रखा, वह घर में आ गया. फिर यह तो बहुत बड़ी चीज़ है उसकी जीवन संगिनी है और हमारे घर की लक्ष्मी भी. जब उसने पसंद कर ली है, तो लड़की तो हमारी हुई. हम थोड़ी प्रतीक्षा कर लेंगे."
पापा ने फिर कहा, "देखिए, अभी बड़ी की शादी करके निबटा हूं. इसके बारे में तो सोचा ही नहीं है. एक तो सबसे छोटी और फिर बिन मां की बच्ची… इस बेचारी को तो कुछ भी नहीं आता, न घर संभालना, न खाना पकाना, यह बेचारी तो ठीक से साड़ी भी नहीं बांध पाती है."
"उसकी आप चिन्ता न करें." संजू की मम्मी ने बीच में ही टोका, "भगवान की दया से घर संभालने और खाना वगैरह बनाने के लिये नौकर-चाकर हैं हमारे घर में. इसको तो रसोई में कदम भी रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. रही साड़ी वगैरह की बात तो जैसे हमारी मंजू वैसी ही बिन्नो, और फिर आजकल तो लड़कियां जीन्स-पैंट में घूमती हैं. मंजू के जाने के बाद यही तो उसकी कमी पूरी करेगी." पापा ने कितना समझाया था, पर उनकी एक न चली, वे रिश्ता पक्का करके चले गए.
जाते-जाते बिन्नो की सास दोबारा कह गई थी, "भाईसाहब, चिंता मत करिए, बिन्नो बिल्कुल मंजू की तरह रहेगी."

यह सब ढकोसला था क्या? बिन्नो को तो खुले गले का ब्लाउज़ पहनने से भी मना कर दिया गया. फिर वह जीन्स या स्कर्ट के सवाल तो भूल ही जाए. बिन्नो ने डबडबाई आंखों से नीली ज़री की साड़ी और ऊंचे गले का ब्लाउज़ निकाल कर पहना और नीचे आ गई.
फिर वही बायोलॉजी का मेंढक और पूरी की पूरी क्लास. उस दिन फ़र्क केवल इतना था कि क्लास में चेहरे कुछ नए थे. वह कटे मेढ़क की तरह निर्जीव सी बैठी रही और मशीन की तरह पैर छू-छू कर रुपए मंजू को पकड़ाती रही.
उसके अन्दर ही अन्दर रुलाई के बादल उमड़-घुमड़ कर रहे थे. क्या सुहाने दिन थे मायके के और अब क्या हो गया. उसका जी चाह रहा था कि सब लोग थोड़ी देर के लिए विलीन हो जाएं. उसे अकेला छोड़ दें, जिससे वह जी भर के रो ले, जैसे वह छुटपन में मां की गोद में छुप कर रोती थी. एक बार मां की गोद में खुस गई, तो मानो सारी दुनिया विलीन हो गई और वह अकेली हो गई. घूंघट के अदर ही उसकी रुलाई निकल पड़ी.
इससे पहले कि अगली औरत मुंह दिखाई के लिए आ पाती बिन्नो ने जल्दी से रुमाल घूंघट के अंदर ले जाकर आंसू पोंछ लिए.
पास ही बैठी मंजू ने पूछा, "तबियत तो ठीक है न भाभी."
बिन्नो ने बहाना बना दिया, "सिर में थोड़ा दर्द हो रहा है."
बिन्नो की सास को बताया गया तो तुरंत आदेश हो गया कि मंजू, बिन्नो को उसके कमरे में ले जाए.
कमरे में पहुंचकर बिन्नो को बड़ी राहत मिली. मंजू ने उसका घूंघट हटाकर उसे लेटा दिया और उसके सिरहाने बैठ कर उसका सिर दबाने लगी.
"रहने दो दीदी, अभी ठीक हो जाएगा." दोनों बातें करने लगीं. धीरे-धीरे बिन्नो का ध्यान बंटा तो उसका जी हल्का हो गया. धीरे-धीरे दोनों की बातों का दायरा बढ़ता गया. अपने-अपने कॉलेज की बातें, सहेलियों के क़िस्से, फिल्मों की बातें… न जाने क्या क्या बातें होने लगीं. वक़्त का पता ही न चला. न ही बिन्नो को यह ध्यान रहा कि वह अपनी ससुराल में है. अचानक बात करते-करते मंजू ने चक्की ताई की नकल उतारी. बिन्नो का तो हंस-हंसकर बुरा हाल हो गया. उसके ठहाके उसके कमरे से होते हुए शायद नीचे तक पहुंच गए, जिसका पता तब चला जब बुआजी दहाड़ी, "देखो तो, कैसे खी-खी कर रही हैं मुंह फाड़ के. इतना भी ख़्याल नहीं है कि घर में मेहमान बैठे हैं. किसने कहा था भाभी, यह डेढ़ बित्ते की लड़की उठा लाने को… घरवालों ने ज़रा भी तमीज़ नहीं सिखाई."

बिन्नो की हंसी को ब्रेक लग गया. उसे ध्यान आया कि वह अपने सुसराल में है, पर तब तक देर हो चुकी थी. उसकी सास ऊपर आ चुकी थी. आते ही उन्होंने मंजू को डांटा, "क्या खी-खी लगा रखी है. तुझे बिन्नो को आराम कराने के लिए भेजा था. ऐसे भी भला हंसा जाता है कि पूरा मोहल्ला सिर पर उठा ले."
डांट तो मंजू को पड़ी थी, पर बिन्नो जानती थी कि निशाना वही थी. सास अपना कठोर चेहरा लेकर वापस चली गई. मंजू भी मां की डांट खाकर खिसक ली.
बिन्नो को मायके की याद आ गई. एक दिन उसने घर भर से रूठ कर मौनव्रत धारण कर लिया था. न सिर्फ़ पूरा घर, बल्कि मुहल्ले की कुछ पड़ोसिनें भी आ गई थीं यह पूछने कि आज बिन्नो घर पर नहीं है क्या? उसकी हंसी नहीं सुनाई पड़ी. पापा ने ऑफिस से आते ही पूछा, "तेरी तबियत तो नहीं ख़राब है आज तेरे ठहाके नहीं सुनाई पड़ रहे."
"नहीं ठीक हूं."
"तो फिर बेटा, हर समय हंसती ही रहा कर. तेरी हंसी की आवाज़ बंद होती है, तो मुझे घबराहट होती है कि कहीं तू बीमार तो नहीं है."
एक मेरा पीहर था, जहां मेरी हंसी की इतनी कद्र थी और एक यहां… अकेले कमरे में वह फूट-फूट कर रोने लगी. आख़िर छोटी सी बच्ची ही तो थी बिन्नो. इतने अजनबियों के बीच में किससे कहे वह अपने मन की व्यथा… सभी नए लगते थे और पराए भी. संजू पर भी कितना विश्वास करे, कहीं उसी ने मम्मी से जाकर शिकायत कर दी तो? घर पर फोन करेगी, तो वहां सबको तकलीफ़ होगी. कितनी हिम्मत बंधाकर भेजा था सबने, "तू जिस घर की अमानत है, उसी घर में जा रही है. उस घर में तुझे मां मिलेंगी. अब वहीं तेरी मां है."
ऐसी भी कहीं मां होती है… बिल्कुल पत्थर, पहले तो कितनी बढ़-चढ़ कर बातें करती थीं, और अब? मेरे पापा को भी बुद्धू बनाया. बिन्नो रोते-रोते सो गई.
शाम को पांच बजे आंख खुली, तो उसका सिर भारी हो रहा था. ससुराल, शादी, पति, सासू मां, नया घर… कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था उसे. उसे अपनी सहेलियां, अपनी आजादी याद आने लगी.
ऐसी तबियत अगर उसके घर में हुई होती, तो उसने पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया होता और पूरा मोहल्ला ही उसकी तीमारदारी में लग गया होता. उसका मन हो रहा था कि वह बस किसी तरह उड़ कर अपने घर पहुंच जाए, पर अभी तो उसे अपने घर जाने में एक हफ़्ता बाकी था. और फिर अगर वह चली भी गई तो कितने दिन रह लेगी वहां… हमेशा के लिए तो नहीं न. कितनी अजीब बात है लड़कियों के लिए. अपने घर में वह उम्रभर पराए घर की अमानत रहती है और जिस घर की अमानत है, वहां पराई जैसी लगती है. दरवाजे पर खटका सुन कर वह पलटी, तो देखा सास खड़ी थी. "कैसी तबियत है?"
"ठीक हूं." नपा-तुला जवाब दिया बिन्नो ने. एक तो नई बहू और फिर छोटी उम्र की होने के कारण वह डरती थी कि कहीं मुंह से कोई ग़लत बात न निकल जाए,
सास ने उसका चेहरा देखा तो चौंक गई, "अरे तेरी आंखें तो सूजी हुई हैं. तू रोई थी बेटा?"
ससुराल में अपने लिए पहली बार, 'बेटा' शब्द सुन कर बिन्नो की थोड़ी हिम्मत बंधी, बहुत रोकते हुए भी उसका चार दिन का दबा हुआ उबाल उनके होंठों पर आ ही गया. उसने रुंधे गले से कहा, "मां! एक बात पूंछू."
"पूछ."
"पैदा होने के बाद से ही लड़कियों को कहा जाता है कि वह पराया धन है… पराई अमानत है… उन्हें पराये घर जाना है… जो उनका असली घर है और जब मैं इस घर में आई, जिस घर की मैं अमानत थी, तो मुझे अपनाए जाने में सबको बड़ी कठिनाई हो रही है. मैं अपने मायके में सारी ज़िंदगी पराई अमानत रही और अब यहां भी पराई हूं, कौन सा है मेरा असली घर?"
बिन्नो की सास उसे थोड़ी देर घूरती रहीं.
कुछ न बोलीं, 'शायद मां के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है या मैंने ही कुछ ग़लत पूछ लिया' बिन्नो ने घबराकर सोचा. बिन्नो की सास बिना कुछ बोले उसकी आलमारी से कपड़े निकालने लगी.
"मैंने आलमारी से तेरे कपड़े निकाल दिए हैं. यही पहन कर नीचे आ जाना." उसकी सास इतना आदेश दे कमरे से बाहर निकल गई. इसके अलावा कुछ न बोली. उनका चेहरा और कठोर हो गया था.

सीढ़ी सीधी ड्रॉइंगरूम में उतरती थी. बन्नो ने जैसे ही सीढ़ी पर कदम रखा, सारे मेहमानों की सांस ऊपर की ऊपर ही रह गई. बिन्नो सफ़ेद जींस और काली टी-शर्ट पहने हुए नीचे उतर रही थी. खुले बालों में वह एकदम बच्ची लग रही थी.
सबसे पहले बुआजी ही दहाड़ी, "अरे भाभी! देखा तो अपनी लाडो…"
इससे पहले कि बुआजी अपना वाक्य पूरा कर पातीं बिन्नो की सास की आवाज़ गूंजी, "यह कपड़े मैंने ही उसे निकाल कर दिए है., देखो तो कितनी प्यारी लग रही है." बुआजी कहां माननेवाली थीं, पूरा गुबार निकालने पर उतारू थीं, "ये! क्या गज़ब कर रही हो भाभी। इतने मेहमानों के सामने कुछ तो ख़्याल कर लिया होता."
"कर लिया बहुत ख़्याल. जिसने जैसा कहा, मैंं उससे वैसा ही कराती रही. उसका आना-जाना, हंसना-बोलना, पहनना-ओढना सब पर अंकुश लगा दिया था आप लोगों ने. जैसा आप सबने आदेश किया, उस बेचारी ने माना… बिना चूं किए चार दिन में आप लोगों का ख़्याल करके मन मसोस कर रही. पलट कर कुछ भी नहीं कहा. आप लोगों ने बहू बना कर रखा उसे, पर मैं बेटी लाई थी घर में, बहू नहीं. अगर आप सबके बहू के अरमान अभी भी बाकी हैं, तो में अभी ज़िंदा हूं. आप लोग अपने अरमान मुझ पर निकाल सकते हैं. या अपने-अपने घर में अपनी बहुओं पर निकाल लें. मैं हूं आपकी बहू, यह नहीं. यह मेरी बहू है और इस पर मैं अपने अरमान निकालूंगी जैसे चाहूंगी वैसे रखूंगी. और मैं सबके सामने ऐलान करती हूं कि यह मंजू की जगह आई है और मंजू की तरह ही रहेगी… बहू की तरह नहीं. बिन्नो इस घर की अमानत थी और अब अपने घर में आ गई है." पूरी बात एक सांस में कही गई थी. सब सहम गए थे. किसी के मुंह से कोई भी बोल नहीं फूट रहे थे और बिन्नो की ख़ुशी का तो कोई पारावार ही न था… वह समझ गई थी कि चार दिनों से सासू मां की कठोरता मेहमानों के व्यवहार के लिए थी, उसके लिए नहीं, वह दौड़ कर उनसे लिपट गई.

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01/11/2024

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गौर से देखिएगा कभी उन स्त्रियों का चेहरा जिनके विवाह सफल नहीं हुए या पति जल्दी चले गए ..

आपको एहमियत समझ में आ जाएगी एक स्त्री के जीवन में पुरूष के क्या मायने हैं 😊

शारीरिक रूप से स्त्री एक नहीं हजारों पुरुषों की प्रेमिका हो सकती हैं लेकिन..

उसे सर का ताज गृह लक्ष्मी अपना मान ये हर कोई नहीं बना सकता है उसे मानसिक रूप से हर पुरूष नही संभाल सकता है...

भले वो परिवार की धुरी है पर उसे भी एक समतल स्थान चाहिए स्वछंद होकर घूमने के लिए 😊

याद रखिए जब आप कहते है कि एक विवाहिता की उम्र देख कर नहीं लगता कि वो शादीशुदा है या बच्चों की मां है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान उस पुरूष का होता है जो किसी की घर की राजकुमारी को अपने घर की रानी बनाकर रखता है...

पिता के बाद पति ही होते हैं जो पत्नियों के लिए हमेशा अमीर होते है ❤️

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