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न अल्लाह न अली न हुसैन कोई नहीं बचा पाया  🤬             बेचारे उम्मती को क्योंकि पिछवाड़े में मिसाइल घुसी थी इजरायल की ज...
04/03/2026

न अल्लाह न अली न हुसैन कोई नहीं बचा पाया 🤬



बेचारे उम्मती को क्योंकि पिछवाड़े में मिसाइल घुसी थी इजरायल की जिहादियों का असली शिकारी बेंजामिन नेतन्याहू।"

jo kahta Hu Wo Karta Hu Kyonki Main Hu Trump
03/03/2026

jo kahta Hu Wo Karta Hu Kyonki Main Hu Trump






आ जाओ रज़ा, तड़पाओ मत”बरसात की रात थी। खिड़की से आती ठंडी हवा दिल की गर्मी को और भड़का रही थी। रज़ा की यादें आज कुछ ज़्य...
07/01/2026

आ जाओ रज़ा, तड़पाओ मत”

बरसात की रात थी। खिड़की से आती ठंडी हवा दिल की गर्मी को और भड़का रही थी। रज़ा की यादें आज कुछ ज़्यादा ही बेचैन कर रही थीं।
मोबाइल स्क्रीन बार-बार देखती, मगर उसका नाम चमकता नहीं।

“आ जाओ रज़ा… तड़पाओ मत,”
उसने धीमे से कहा, जैसे शब्दों में भी इंतज़ार की थकान उतर आई हो।

हर लम्हा, हर सांस उसी के नाम थी। वक्त जैसे ठहर गया था, और दिल उसी मोड़ पर खड़ा था जहाँ से रज़ा के आने की आहट सुनाई देती थी।
दरवाज़े की हर आहट पर दिल उछल पड़ता,
और हर सन्नाटे में तड़प और गहरी हो जाती।

ये तड़प सिर्फ मिलने की नहीं थी,
ये उस एहसास की थी
जो बिना छुए भी रूह को छू जाए।




ाओ_रज़ा
#तड़प
#इंतज़ार
#अधूरी_ख्वाहिश

मैं आपको साल 2012 की एक घटना बताना चाहती हूँ।मैं झारखंड के गोड्डा से रांची, एक परीक्षा देने के लिए बस से यात्रा कर रही थ...
06/01/2026

मैं आपको साल 2012 की एक घटना बताना चाहती हूँ।

मैं झारखंड के गोड्डा से रांची, एक परीक्षा देने के लिए बस से यात्रा कर रही थी। हमारे राज्य में तब — और आज भी कई जगहों पर — ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि अकेली यात्रा कर रही महिला को महिला यात्री के पास या खाली सीट पर बैठाया जाए।

रात के करीब आठ बजे मैं गोड्डा बस स्टैंड से बस में बैठी। कुछ देर बाद मेरी बगल वाली सीट पर एक युवक आकर बैठा। पहली नज़र में वह बिल्कुल सामान्य और सभ्य लगा।
लेकिन जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी, उसकी हरकतें बदलने लगीं।

बस में तेज़ आवाज़ में गाने बज रहे थे। आसपास बैठे लोगों को अंदाज़ा भी नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। उसने नींद का नाटक करते हुए मेरे शरीर को छूना शुरू किया। पहली बार मुझे लगा शायद गलती से हुआ होगा।

मैंने करवट बदली, उसने हाथ हटा लिया।
मैं बेहद थकी हुई थी और कुछ देर बाद गहरी नींद में चली गई।

जब मेरी आंख खुली, तो जो मैंने महसूस किया—उसने मुझे भीतर तक सुन्न कर दिया।
मेरे शरीर के साथ ज़बरदस्ती की जा रही थी।

मैं अवाक् रह गई। समझ नहीं आ रहा था कि कोई इतना बेखौफ़ कैसे हो सकता है। जैसे ही मेरी नींद खुली, उसने फिर हाथ हटा लिया—मानो कुछ हुआ ही न हो।

मेरे मन में डर बैठ गया।
बस में कुछ परिचित चेहरे थे।
मैं सोचने लगी—अगर मैंने आवाज़ उठाई तो क्या लोग मुझ पर ही सवाल नहीं उठाएंगे?
क्या बात पूरे शहर में नहीं फैल जाएगी?

इन्हीं डरोंने मुझे चुप करा दिया।

मेरी खामोशी का फायदा उठाया गया।
पूरे रास्ते मैं डर, शर्म और असहायता के बीच फंसी रही।
मेरे साथ शोषण होता रहा—और मैं कुछ कह नहीं पाई।

वक्त बीत गया।
ज़िंदगी आगे बढ़ती गई।
वो घटना कहीं मन के कोने में दब गई।

लेकिन आज, सालों बाद, वह याद फिर ज़िंदा हो गई।
और मैंने तय किया—अब चुप नहीं रहूंगी।

मैं जानती हूँ, उस रात मेरी तरह न जाने कितनी लड़कियां हर रोज़ बसों, ट्रेनों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर ऐसी ही हिंसा झेलती होंगी।
और शायद डर, समाज और बदनामी के कारण वे भी चुप रह जाती होंगी।

तो सवाल आज भी वही है—
क्या इस भारत पर हम महिलाओं को गर्व होना चाहिए,
जब हमारी चुप्पी को हमारी सहमति समझ लिया जाता है?
















मार राजा मारमारता किधर है, जाता किधर है #मारराजामार #राजपूतानास्वैग #खूनीडायलॉग #देसीएक्शन #रॉयलएटीट्यूड #हिंदीडायलॉग #फ...
05/01/2026

मार राजा मार
मारता किधर है, जाता किधर है

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उम्र से बड़ी थी खामोशी 🔥पचपन साल की वह विधवा औरत…जिसकी आँखों में ज़िंदगी से ज़्यादा सन्नाटा था।सारी उम्र रिश्तों और ज़िम...
04/01/2026

उम्र से बड़ी थी खामोशी 🔥

पचपन साल की वह विधवा औरत…
जिसकी आँखों में ज़िंदगी से ज़्यादा सन्नाटा था।
सारी उम्र रिश्तों और ज़िम्मेदारियों ने
उसे औरत नहीं,
एक आदत बना दिया था।

तेईस साल का वह नौजवान…
जिसकी रगों में जवानी उबाल मार रही थी,
पर अनुभव कम
और बेचैनी ज़्यादा थी।
दोनों एक ही छत के नीचे मिले।
वह उसे समझाना चाहती थी,
और वह उसे देखना…
पर नज़रें
अपनी ही भाषा बोलने लगीं।

उसकी हल्की-सी मुस्कान
उस लड़के के दिल में
कुछ जगा गई।
और उसकी मौजूदगी
उस औरत के भीतर
बहुत कुछ हिला गई।

रातें लंबी होने लगीं,
बातें गहरी,
और खामोशी
भारी।

यह प्रेम नहीं था,
पर खालीपन भी नहीं।
यह वह आग थी
जो धीरे-धीरे
सीने में फैलती है।

शब्द नहीं बोले गए,
पर एहसास
बहुत साफ़ थे।
आँखों ने
वह सब कह दिया
जो ज़ुबान नहीं कह पाई।

सुबह जब दोनों अलग हुए,
तो मन हल्का नहीं था—
अजीब-सा बोझ था।

क्योंकि प्रेम कम था…
और जो जला,
वह
हवस की आग थी
जो देर तक बुझी नहीं।

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बारिश, ख़ामोशी और एक अनकही कहानीबरसात ज़ोरों पर थी। चौराहा सुनसान पड़ा था। पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे गिरती बारिश की बूँद...
03/01/2026

बारिश, ख़ामोशी और एक अनकही कहानी

बरसात ज़ोरों पर थी। चौराहा सुनसान पड़ा था। पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे गिरती बारिश की बूँदें ज़मीन से टकराकर अजीब-सी धुन बना रही थीं।
अरविंद भीगे हुए कपड़ों के साथ वहीं रुका हुआ था, तभी उसकी नज़र सामने खड़ी नग़मा पर पड़ी।

नग़मा की ज़ुल्फ़ें भीग चुकी थीं, आँखों में थकान थी, लेकिन चेहरे पर एक गहरी शांति।
अरविंद ने धीमे स्वर में कहा,
“तुम… यहाँ इस वक्त?”

नग़मा हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“शायद कुछ मुलाक़ातें मौसम नहीं देखतीं।”
दोनों के बीच कुछ पल की ख़ामोशी छा गई। बरसात जैसे उनकी बातों को सुन रही थी। बीते हुए लम्हे, अधूरे एहसास और दबे हुए जज़्बात हवा में घुलने लगे।

नग़मा ने नज़रें उठाकर अरविंद को देखा। उस नज़र में सवाल भी था और जवाब भी।
अरविंद ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। वह स्पर्श सिर्फ़ हाथों तक सीमित नहीं था, वह सीधे दिल को छू गया।

उस बरसाती रात कोई शब्द ज़रूरी नहीं थे।
ख़ामोशी ही उनकी समझ बन गई,
और बारिश गवाह बन गई
दो दिलों के क़रीब आने की।

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“नज़रों की नहीं, हिम्मत की ज़रूरत होती है”💘दिखावे पर रंग बदलने वालों,हिम्मत है तो सच के सामने आकर अपनी असली सोच दिखाओ।” ...
01/01/2026

“नज़रों की नहीं, हिम्मत की ज़रूरत होती है”💘

दिखावे पर रंग बदलने वालों,
हिम्मत है तो सच के सामने आकर अपनी असली सोच दिखाओ।”










साल के पहले दिन दिल की खामोश पुकार…आज, साल के पहले ही दिन, दिल बेचैन है…कौन है जो मुझे शांति, सुकून और थोड़ा-सा अपनापन द...
01/01/2026

साल के पहले दिन दिल की खामोश पुकार…

आज, साल के पहले ही दिन, दिल बेचैन है…
कौन है जो मुझे शांति, सुकून और थोड़ा-सा अपनापन दे सके?”

#नयासाल
#पहलादिन
#दिलकीबात
#शांति
#सुकून





खामोश मर्द नहीं, असर चाहिए”मैं उस मर्द की इज़्ज़त नहीं करती, जिसकी मौजूदगी की तपिश से दिल न धड़के,जिसके हर झटके में जुनू...
31/12/2025

खामोश मर्द नहीं, असर चाहिए”

मैं उस मर्द की इज़्ज़त नहीं करती, जिसकी मौजूदगी की तपिश से दिल न धड़के,
जिसके हर झटके में जुनून की लय न हो,
और जिसकी छुअन से लबों पर अपने-आप ‘आह’ की मीठी सी आवाज़ न उभर आए















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