06/01/2026
मैं आपको साल 2012 की एक घटना बताना चाहती हूँ।
मैं झारखंड के गोड्डा से रांची, एक परीक्षा देने के लिए बस से यात्रा कर रही थी। हमारे राज्य में तब — और आज भी कई जगहों पर — ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि अकेली यात्रा कर रही महिला को महिला यात्री के पास या खाली सीट पर बैठाया जाए।
रात के करीब आठ बजे मैं गोड्डा बस स्टैंड से बस में बैठी। कुछ देर बाद मेरी बगल वाली सीट पर एक युवक आकर बैठा। पहली नज़र में वह बिल्कुल सामान्य और सभ्य लगा।
लेकिन जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी, उसकी हरकतें बदलने लगीं।
बस में तेज़ आवाज़ में गाने बज रहे थे। आसपास बैठे लोगों को अंदाज़ा भी नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। उसने नींद का नाटक करते हुए मेरे शरीर को छूना शुरू किया। पहली बार मुझे लगा शायद गलती से हुआ होगा।
मैंने करवट बदली, उसने हाथ हटा लिया।
मैं बेहद थकी हुई थी और कुछ देर बाद गहरी नींद में चली गई।
जब मेरी आंख खुली, तो जो मैंने महसूस किया—उसने मुझे भीतर तक सुन्न कर दिया।
मेरे शरीर के साथ ज़बरदस्ती की जा रही थी।
मैं अवाक् रह गई। समझ नहीं आ रहा था कि कोई इतना बेखौफ़ कैसे हो सकता है। जैसे ही मेरी नींद खुली, उसने फिर हाथ हटा लिया—मानो कुछ हुआ ही न हो।
मेरे मन में डर बैठ गया।
बस में कुछ परिचित चेहरे थे।
मैं सोचने लगी—अगर मैंने आवाज़ उठाई तो क्या लोग मुझ पर ही सवाल नहीं उठाएंगे?
क्या बात पूरे शहर में नहीं फैल जाएगी?
इन्हीं डरोंने मुझे चुप करा दिया।
मेरी खामोशी का फायदा उठाया गया।
पूरे रास्ते मैं डर, शर्म और असहायता के बीच फंसी रही।
मेरे साथ शोषण होता रहा—और मैं कुछ कह नहीं पाई।
वक्त बीत गया।
ज़िंदगी आगे बढ़ती गई।
वो घटना कहीं मन के कोने में दब गई।
लेकिन आज, सालों बाद, वह याद फिर ज़िंदा हो गई।
और मैंने तय किया—अब चुप नहीं रहूंगी।
मैं जानती हूँ, उस रात मेरी तरह न जाने कितनी लड़कियां हर रोज़ बसों, ट्रेनों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर ऐसी ही हिंसा झेलती होंगी।
और शायद डर, समाज और बदनामी के कारण वे भी चुप रह जाती होंगी।
तो सवाल आज भी वही है—
क्या इस भारत पर हम महिलाओं को गर्व होना चाहिए,
जब हमारी चुप्पी को हमारी सहमति समझ लिया जाता है?