29/10/2024
किसी भी व्यक्ति की , वस्तु की सहज उपलब्धता उस व्यक्ति या वस्तु का भाव गिरा देता है ।
स्वर्ण कितना ही सुंदर क्यों न हो , हीरा कितना ही सुंदर क्यों न हो , अगर वह सहज और हर जगह प्राप्त होने लगे तो तुरंत उसकी कीमत और उसके मूल्य में अवमूल्यन आ जायेगा ।
आपको पता है कि संसार की सबसे मुल्यवान चीज़ क्या है ??
मिट्टी । यह जीवन का आधार है । इसी से सब अन्न , जल , भोजन सब प्राप्त होता है । इसी से प्रत्येक धातुओं का निर्माण होता है ।
मिट्टी न मिले तो लोग भोजन और पानी के अभाव से मर जायें , अरे वायु का भी कारण यही मिट्टी है क्योंकि इसकी मिट्टी में पनपने वाली वनस्पतियाँ ही तो ऑक्सीजन वायु को देती हैं ।
लेकिन मिट्टी का कोई मोल नहीं ।
और वहीं हीरा किसी काम का नहीं , स्वर्ण में आप कोई वनस्पति या किसी भी चीज़ का उत्पादन नहीं कर सकते , platinum की कोई उपयोगिता नहीं , लेकिन इनकी कीमत है , इनका मूल्य है ।
जानते हैं क्यों ?? क्योंकि यह बहुत ही विरले स्थान पर प्राप्त हैं , अनुपलब्ध है , और इनको प्राप्त करने के लिए मनुष्य को बहुत ही उद्योग करना पड़ता है ।
यही मनुष्य की प्रवृत्ति है । जो सहज रूप से उपलब्ध होगा भले उसकी उपयोगिता उच्चतम हो , फिर भी उसका कोई मूल्य नहीं करते ।
और एक बात संसार में बहुत ही ध्यान देने योग्य है कि किसी को भी कोई चीज़ वस्तु या व्यक्ति भी मुफ्त या सहज रूप से नहीं प्राप्त होना चाहिए ।
मनुष्य उसकी कोई कीमत नहीं करता जो सहज रूप से प्राप्य हो ।
इसीलिए जब जीव कल्याण निमित्त आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने चारों धाम की स्थापना की थी , या शक्तिपीठों की स्थापना की थी तो उन्होंने बहुत ही दुर्लभ , दुर्गम स्थानों पर पहाड़ों में , कंदराओं में इनकी स्थापना की । क्योंकि वह जानते थे मनुष्य का स्वभाव ।
इसीलिए आज जितने प्राचीन मंदिर या शक्तिपीठ हैं , सब दुर्गम स्थानों पर हैं ताकि मनुष्य उद्योग कर यहाँ तक पहुँचे और तब वह उसकी उपयोगिता से आत्मसात हो सके ।
इसीलिए भीषण गर्मी के पश्चात ही प्रकृति वर्षा करती है ।
जब बहुत तेज धूप हो , तभी छाँव की उपयोगिता पता लगती है ।
जब बहुत तेज प्यास हो , पानी न मिल रहा हो , तभी पानी का महत्व पता लगता है ।
इसीलिए आश्रम में गुरु अपने शिष्यों से कठोर श्रम करवाया करते थे , राजा के पुत्र से लेकर सामान्य बालकों से भी लकड़ी बीनने से लेकर आश्रम की साफ सफाई और हाड़ तोड़ श्रम करवाया जाता था ।
बहुत ही उद्योग से तब जाकर गुरु शिष्य को शिक्षा देता था ।
मलय पर्वत पर चन्दन के पेड़ भीलों और वनवासियों के लिए अत्यंत ही सुलभ हैं , तो वह लोग चन्दन को लकड़ियों को ईधन के रूप में प्रयोग करते हैं ।
इसीलिए अति सुलभता और सहजता से बचना चाहिए ।
किसी भी वस्तु को अगर आप मुफ्त में देंगे तो उसका महत्व कोई नहीं करेगा , लेकिन जैसे ही वह packet में बंद और मूल्य कोई तगड़ा सा लगाकर उसे देंगे तो उसकी महत्ता स्वयं बढ़ जाएगी ।
और एक बात और मैंने अनुभव किया है कि आप जबरदस्ती किसी का कल्याण या लाभ नहीं दे सकते । किसी को सही बात बतायेंगे तो वह चौंक कर दूर भागेगा ।
कोई विष्ठा में पड़ा है तो अगर आप उसे निकाल कर फूल में भी करना चाहेंगे तो वह दौड़ कर फिर वहीं जाएगा ।
कोई किसी की प्रकृति नहीं बदल सकता ।
क्योंकि अगर सभी घोड़े बन जायेंगे तो बोझा कौन ढोयेगा ??
सभी कल्याण मार्ग पर चल पड़ेंगे तो संसार का क्रम बाधित होगा ।
अगर कोई बोलता है कि सूर्य गर्मी नहीं देता बल्कि ठंडक देता है , तो उसे एक बार बतायें , न माने तो दूसरी बार बताने की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि उसके सामने ही कम्बल ओढ़ लें मध्य गर्मी में भी कि हाँ देखो कितनी ठंडक है ।
हमारे गाँव में जब लड़ाईयाँ होती थी लोग धमकी देते थे कि हम कुएँ में कूदने जा रहे हैं , तो मेरी माँ ने सबको कहा कि अब जो कुएँ में कूदने को कहे , उसको सब पकड़कर जबरदस्ती कुएँ में डाल दो और ऊपर से चार पाँच ईंटा और पत्थर भी डाल दो कि ताकि वह ऊपर न आने पाए ।
तो ऐसे ही करना चाहिए , कोई कुएँ में कूदे तो उसे एक बार रोको न माने तो दूसरी बार स्वयं कंधे पर बिठाकर या घिसराकर कुएँ में गिरा देना चाहिए ।
यह संसार बड़ा ही विचित्र है । सबकी प्रकृति , संस्कार , समझने का स्तर , विवेक , बुद्धि की क्षमता अलग अलग है ।
आप यह हर किसी से अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह सत्य को स्वीकार कर पायेगा या नहीं ।
अतः हर जगह अपनी सहज उपलब्धता अपनी ही हानि करने करने के बराबर है और साथ ही साथ आप उस गुण का भी अवमूल्यन करते हैं जो हर किसी के लिए सहज सरल रूप से उपलब्ध नहीं होना चाहिए ।
अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमिन्धनं कुरुते ॥
किसी के वहाँ हर रोज़ जाने से और सहज उपलब्धता से मानहानि होती है । जिस तरह मलय पर्वत पर असंख्य चंदन के वृक्ष होने पर वहाँ की भील औरतें उसी चंदन को ईंधन बनाती है।
बस यह सभी बातें वहाँ लागू नहीं हैं जहाँ निश्चल और विशुद्ध प्रेम है ।
क्योंकि प्रेम का कोई आधार नहीं होता , प्रेम का आधार केवल उसका प्रेमास्पद होता है ।