Manisha choudhary

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आज ऑफिस जाते वक्त रास्ते में एक अंकल खड़े दिखे। ऑटो का इंतजार कर रहे थे। मुझे हाथ दिए तो मैने गाड़ी रोकी कर लिफ्ट दे दी।...
09/10/2026

आज ऑफिस जाते वक्त रास्ते में एक अंकल खड़े दिखे। ऑटो का इंतजार कर रहे थे। मुझे हाथ दिए तो मैने गाड़ी रोकी कर लिफ्ट दे दी। रास्ते में बातों का सिलसिला चला तो पता चला कि वो एक अच्छी सरकारी नौकरी में हैं—ऐसा पद जिसकी तनख्वाह मेरी तनख्वाह से लगभग दोगुनी है।

मन में सहज सा कौतूहल जागा, रहा नहीं गया तो पूछ बैठी— "अंकल, ईश्वर की कृपा से इतनी अच्छी स्थिति है आपकी, फिर भी आप इस उम्र में ऑटो की धूप-धूल में वक्त गंवा रहे हैं? एक अच्छी कार ले लीजिए, या कम से कम कैब बुक कर लिया कीजिए। थोड़ा अपने आराम पर भी खर्च कीजिए।"

मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक ऐसी धीमी, सधी हुई मुस्कान आई जिसमें कई बरसों की खामोश तपस्या छुपी थी।
वो बोले— "बेटा! दो बेटियां दिल्ली में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही हैं, एक बेटा लखनऊ में बीटेक के आखिरी दौर में है। घर की, गृहस्थी की, पढ़ाई और उनके सपनों की पूरी पतवार इसी तनख्वाह के भरोसे है। अगर मैं आज अपने आराम, अपने रुतबे और अपने कम्फर्ट के लिए खर्च करने लगूँगा... तो कल उनके सपनों का बजट बिगड़ जाएगा।"

उनकी यह बात सुनकर एक पल को गाड़ी के भीतर का सन्नाटा गहरा गया।
एक पिता, एक अभिभावक जब अपने जीवन से ‘मैं’ शब्द को निकालकर ‘परिवार’ लिख देता है, तो उसकी अपनी जरूरतें अपने आप आखिरी पायदान पर खिसक जाती हैं।
कपड़े थोड़े पुराने हो जाएँ तो चल जाता है, यात्रा थोड़ी कष्टदायक हो तो सह ली जाती है, मनपसंद चीजें खरीदने की इच्छा दबा दी जाती है... सिर्फ इसलिए कि दूर किसी शहर में बैठकर पढ़ रहे बच्चे की फीस में एक दिन की भी देरी न हो।

सच्चाई तो यह है कि दुनिया में सबसे सस्ती चीज़ शायद एक पिता का अपना आराम होता है, जिसे वो बिना किसी शिकायत के अपने बच्चों के भविष्य की बुनियाद में ईंट की तरह चुन देता है।

ईश्वर हर उस निस्वार्थ कंधे को सलामत रखे, जो अपने कुनबे की खुशियों के लिए दिन-रात खामोशी से बोझ उठाता है।

अक्सर पुरुष बहुत जल्दी उत्तेजना और चरम सुख तक पहुंच जाता है.... ✍️ जबकि स्त्री को उसे अवस्था ऑर्गेज्म तक पहुंचने में समय...
08/10/2026

अक्सर पुरुष बहुत जल्दी उत्तेजना और चरम सुख तक पहुंच जाता है.... ✍️
जबकि स्त्री को उसे अवस्था ऑर्गेज्म तक पहुंचने में समय लगता है
स्त्री का भावनात्मक और शारीरिक संसार पुरुष से काफी अलग होता है।
उसके लिए प्रेम केवल एक शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। वह चाहती है कि रिश्ते में अपनापन, सम्मान, विश्वास और आत्मीयता बनी रहे। स्त्री का मन तब खुलता है जब उसे यह महसूस होता है कि सामने वाला व्यक्ति उसे केवल शरीर के रूप में नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं और संवेदनाओं के साथ स्वीकार कर रहा है।
अक्सर पुरुष बहुत जल्दी उत्तेजना और चरमसुख तक पहुँच जाता है, जबकि स्त्री को उस अवस्था(आर्गाज्म )तक पहुँचने में समय, धैर्य और भावनात्मक जुड़ाव की आवश्यकता होती है। उसके लिए प्रेम का अर्थ केवल शारीरिक संबंध नहीं होता, बल्कि स्पर्श की गर्माहट, हाथों का एहसास, पास बैठना, आलिंगन, स्नेह भरी बातें और मानसिक निकटता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। जब वह अपने साथी के साथ सुरक्षित, सहज और प्रेम से भरी हुई महसूस करती है, तभी उसका पूरा अस्तित्व उस अनुभव में शामिल हो पाता है।
स्त्री चाहती है कि उसका साथी उसे समझे, उसकी भावनाओं को महसूस करे और उसे पूरा समय दे। कई बार वह केवल साथ बिताए गए शांत पलों में भी गहरा सुख अनुभव करती है। उसके लिए प्रेम एक धीरे-धीरे खिलने वाली अनुभूति है, जिसमें विश्वास, धैर्य और संवेदनशीलता सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं।
जब रिश्ता केवल शरीर तक सीमित न रहकर दिल और आत्मा के स्तर पर जुड़ता है, तब स्त्री वास्तव में उस गहरे आनंद और संतोष को महसूस कर पाती है, जिसकी तलाश हर संवेदनशील रिश्ते में होती है।

वहां एक वेश्या खड़ी थी। शर्त लिखी थी। वेश्या से संबंध बनाने पर ही दरवाजा खुलेगा। सज्जन व्यक्ति ने इसे पाप समझा और आगे बढ...
08/10/2026

वहां एक वेश्या खड़ी थी। शर्त लिखी थी। वेश्या से संबंध बनाने पर ही दरवाजा खुलेगा। सज्जन व्यक्ति ने इसे पाप समझा और आगे बढ़ गया।,,,,,,,,,,,, दूसरा दरवाजा।,,, वहां एक गाय बंधी थी । लिखा था_गाय को लात मारने पर ही दरवाजा खुलेगा। गाय को लात मारना अधर्म था।, इसलिए वह यहां से भी लोट गया ।............... तीसरा दरवाजा: ‌‌। वहां मांस रखा था। शर्त थी_मांस खाने के बाद ही प्रवेश मिलेगा। उसने मांस को घृणा से देखा और चौथे दरवाजे की और बढ़ गया......... चौथा दरवाज़ा: ‌। वहां शराब की एक बोतल रखी थी। लिखा था_पूरी बोतल पीने पर ही दरवाजा खुलेगा। महल में जाना उसके लिए बहुत जरूरी था। उसने सोचा_पिछले शर्तों की तुलना में यह कम अधर्म है।"उसने पूरी शराब पी ली। शराब पीते ही उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। नमकीन खाने की तलब हुई__उसने मांस खा लिया। कामवासना जागी_उसने वेश्या से संबंध बना लिए_गुस्से में आकर उसने गाय को भी लात मार दी। और अंत में वह महल के अंदर चला गया। ‌ मोरल (नीति शिक्षा): शराब ने उससे वे तीनों अपराध करवा दिए, जो वह जीवन भर कभी नहीं करना चाहता था। इसलिए शराब को हल्के में मत लीजिए। यह रिश्ते, धन दौलत, परिवार, स्वास्थ्य और वर्षों में कमाया हुआ पुण्य_सब कुछ नष्ट कर देती है।।।।।।।


78 सालों में तुम्हें 5 किलो राशन देकर, 500 रुपये गैस में छोड़ कर, 2 हजार खाते में डालकर ऐसे दिखाया जाता है जैसे सरकार ने...
06/10/2026

78 सालों में तुम्हें 5 किलो राशन देकर, 500 रुपये गैस में छोड़ कर, 2 हजार खाते में डालकर ऐसे दिखाया जाता है जैसे सरकार ने जनता पर कोई एहसान कर दिया हो। जबकि सच यह है कि एक आम आदमी जिंदगी भर टैक्स देता है।

पेट्रोल में टैक्स, मोबाइल रिचार्ज में टैक्स, साबुन में टैक्स, कपड़ों में टैक्स, बिजली में टैक्स, घर बनाओ तो टैक्स, मर जाओ तो लकड़ी तक में टैक्स। आदमी पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार को पैसा देता रहता है

बदले में उसे क्या मिलता है। राशन की थैली और चुनावी भाषण मैं एक नया जुमला। लोकतंत्र को भिखारी योजना बना दिया गया है।

अगर कोई पढ़ी-लिखी और दिमाग वाली सरकार हो तो वह जनता को मुफ्त की आदत नहीं लगाएगी बल्कि ऐसा सिस्टम बनाएगी जिससे आदमी खुद कमाने लायक बने। असली सरकार वह होती है जो आदमी को लाइन में खड़ा नहीं करती बल्कि उसके हाथ में काम देती है।

भारत की केंद्र सरकार का सालाना बजट लगभग 48 से 50 लाख करोड़ रुपये का है। राज्यों का अलग बजट है। उत्तर प्रदेश अकेले लगभग 7 लाख करोड़ का बजट चलाता है। राजस्थान करीब 4 से 5 लाख करोड़ का।

मतलब पैसा कम नहीं है, सोच छोटी है। नेता जनता को गरीब रखकर राजा बने रहना चाहते हैं। गरीब आदमी 500 रुपये के लिए वोट बेच देता है, आत्मनिर्भर आदमी सवाल पूछता है। यही असली खेल है।

अगर कोई समझदार प्रधानमंत्री हो तो वह हर जिले में कम से कम 200 से 300 सरकारी इंडस्ट्रियल यूनिट खोल सकता है। टेक्सटाइल, मेडिकल इक्विपमेंट, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, खेती आधारित फैक्ट्री, डेयरी प्लांट, सोलर पैनल यूनिट। लगा सकता है

एक जिले में 50 हजार से 1 लाख रोजगार पैदा हो सकते हैं। देश के 700 से ज्यादा जिलों में यह मॉडल लागू हो जाए तो करोड़ों लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है। लेकिन यहां फैक्ट्री खोलने से ज्यादा ध्यान चुनावी रैली में कुर्सी भरने पर है।

केंद्र सरकार चाहे तो हर युवा को 2 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त बिजनेस स्टार्टअप फंड दे सकती है। कोई कपड़े की दुकान खोले, कोई डेयरी, कोई मेडिकल स्टोर, कोई मोबाइल रिपेयर, कोई ट्रैक्टर सर्विस सेंटर।

10 करोड़ युवाओं को भी 2 लाख दिए जाएं तो 20 लाख करोड़ लगेंगे, लेकिन यह पैसा खर्च नहीं निवेश होगा क्योंकि आदमी कमाएगा तो टैक्स वापस आएगा। और इसकी जगह अभी क्या हो रहा है। बेरोजगार को 2 हजार भत्ता देकर शांत रखो और पांच साल बाद फिर वही फोटो खिंचवा लो।

एक पढ़ी-लिखी सरकार गांव मे मिनी हॉस्पिटल, सरकारी कोल्ड स्टोरेज, खेती, मशीन बैंक, फ्री वाईफाई टावर, स्किल, ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी प्लांट, सोलर बिजली , यूनिट, स्पोर्ट्स ग्राउंड, डिजिटल लाइब्रेरी, लड़कियों के लिए हॉस्टल, लोकल फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकतीं हैं

एक गांव पर साल के 20 से 30 करोड़ खर्च हों तो गांव की पूरी तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यहां पंचायत भवन की टूटी कुर्सी पर ही विकास खत्म हो जाता है।

राज्य सरकार चाहे तो हर जिले में फ्री कोचिंग यूनिवर्सिटी खोल सकती है
हर तहसील में 24 घंटे ट्रॉमा सेंटर बना सकती है सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से बेहतर बना सकती है किसानों के लिए फसल खरीद की गारंटी दे सकती है हर गरीब परिवार को 300 यूनिट मुफ्त बिजली दे सकती है महिलाओं को लोकल रोजगार मिशन से जोड़ सकती है

हर शहर में सरकारी किराये के मकान बना सकती है सोचो अगर सरकार हर जिले में 1000 करोड़ की इंडस्ट्री लगाए और 50 जिले हों तो 50 हजार करोड़ लगेंगे। नेताओं के कर्ज माफ करने, चुनावी विज्ञापन, फालतू परियोजनाओं और भ्रष्टाचार में इससे ज्यादा पैसा उड़ जाता है।

आज हमें क्या मिल रहा है 5 किलो राशन, गैस सिलेंडर में सब्सिडी, 1000-3000 भत्ता, चुनाव से पहले मुफ्त घोषणा, फिर पांच साल की चुप्पी

अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ मिल सकता है स्थायी रोजगार, फ्री स्किल शिक्षा, सस्ता इलाज, मजबूत सरकारी स्कूल, लोकल फैक्ट्री, ब्याज मुक्त बिजनेस लोन, गांव में उद्योग, युवाओं को तकनीकी ट्रेनिंग, किसानों के लिए प्रोसेसिंग यूनिट, महिलाओं के लिए घर के पास काम लेकिन यह सब नहीं हो रहा

दुनिया के कई देशों ने यही किया। चीन ने गांव-गांव फैक्ट्री पहुंचाई। जर्मनी ने स्किल सिस्टम मजबूत किया। जापान ने लोकल इंडस्ट्री बचाई। भारत में क्या हुआ।

यहां नेता हेलीकॉप्टर से उतरकर गरीब के घर खाना खाकर फोटो खिंचवा लेते हैं और अगले दिन वही गरीब आदमी मजदूरी पर चला जाता है।

असल विकास वह नहीं जो पोस्टर में दिखे। असली विकास वह है जिसमें आदमी को किसी नेता के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लोकतंत्र का मतलब मुफ्त राशन नहीं, मजबूत नागरिक होता है।

लेकिन मजबूत नागरिक नेताओं को पसंद नहीं आते। उन्हें भीड़ चाहिए, सोचने वाले लोग नहीं। इंसान को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

जिस रात मेरे ससुर ने मुझे गैर-मर्द के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया, मुझे लगा अब मेरा घर हमेशा के लिए बिखर जाएगा।मुझे डर था क...
06/10/2026

जिस रात मेरे ससुर ने मुझे गैर-मर्द के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया, मुझे लगा अब मेरा घर हमेशा के लिए बिखर जाएगा।

मुझे डर था कि वह सब कुछ मेरे पति आकाश को बता देंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने बस मेरी ओर देखा और गंभीर आवाज़ में कहा—

“मेरे साथ अंदर चलो।”

मैं कांपते हुए उनके पीछे चल पड़ी।

मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। मुझे लग रहा था कि शायद आज मेरे परिवार का अंत हो जाएगा।

जैसे ही हम उनके कमरे में पहुँचे, उन्होंने दरवाज़ा बंद करने को कहा।

लेकिन बंद दरवाज़े के पीछे मेरा इंतज़ार सज़ा नहीं… बल्कि मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक कर रहा था।

बाहर से हमारा परिवार बिल्कुल खुशहाल दिखाई देता था।

मेरे पति आकाश बेहद सीधे और मेहनती इंसान थे। वह लकड़ी के कारखाने में दिन-रात मेहनत करते ताकि हमारे परिवार को किसी चीज़ की कमी न हो।

हमारी एक छोटी बेटी थी, जो मेरे लिए पूरी दुनिया थी।

और मेरे ससुर… वह सख्त जरूर थे, लेकिन दिल से बहुत अच्छे इंसान थे। वह घर के कामों में मेरी मदद करते और अपनी पोती को स्कूल छोड़ने-लाने की जिम्मेदारी भी निभाते थे।

लोग कहते थे कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ।

लेकिन मेरे दिल में एक खालीपन था।

आकाश काम के सिलसिले में अक्सर घर से बाहर रहते थे। धीरे-धीरे मेरी अकेलेपन की भावना बढ़ती गई।

तभी मेरी मुलाकात अपने पुराने सहपाठी समीर से हुई।

वह मुझसे बातें करता, मेरी परेशानियाँ सुनता और मुझे हँसाता।

धीरे-धीरे दोस्ती ने ऐसी सीमा पार कर दी, जिसे मुझे कभी पार नहीं करना चाहिए था।

मैं जानती थी कि मैं गलत कर रही हूँ।

लेकिन इंसान कई बार अपनी गलतियों को सही साबित करने के लिए खुद से ही झूठ बोलता है।

मैं भी यही कर रही थी।

फिर एक दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं उस इंसान के विश्वास को तोड़ रही हूँ, जिसने मेरे लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

एक रात समीर से मिलने के बाद जब मैं घर लौटी, तो मुख्य दरवाज़े पर मेरे ससुर खड़े थे।

उनकी आँखें सब कुछ कह रही थीं।

मैंने सफाई देने की कोशिश की…

लेकिन मेरे पास कोई शब्द नहीं था।

मैं उनके पैरों में गिर पड़ी और रोते हुए कहा—

“पिताजी… आकाश को मत बताइए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”

वह काफी देर तक खामोश रहे।

उनकी आँखों में गुस्सा कम और निराशा ज्यादा थी।

उस रात के बाद घर का माहौल बदल गया।

मुझे हर वक्त लगता था कि मेरा राज खुल जाएगा।

आखिरकार मैंने फैसला किया कि अब मुझे अपनी गलती स्वीकार करनी होगी।

मैं दोबारा ससुर जी के पास गई और उनसे कहा—

“मैं अपनी गलती सुधारना चाहती हूँ। कृपया मेरा परिवार टूटने से बचा लीजिए।”

उन्होंने कुछ देर मेरी ओर देखा और कहा—

“मैं तुम्हें एक मौका दे सकता हूँ… लेकिन मेरी एक शर्त है।”

मैंने कांपती आवाज़ में पूछा—

“आप जो कहेंगे, मैं करूंगी।”

उन्होंने अपने कमरे की ओर इशारा किया।

“अंदर आओ।”

मैं उनके पीछे कमरे में गई।

उन्होंने अलमारी खोली और एक पुरानी डायरी तथा फोटो एल्बम बाहर निकाला।

एल्बम में हमारे परिवार की तस्वीरें थीं।

मेरी बेटी की पहली मुस्कान…

आकाश के साथ हमारी शादी की तस्वीर…

त्योहारों पर पूरे परिवार की तस्वीरें…

और हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ।

फिर उन्होंने डायरी खोली।

वह उनकी निजी डायरी थी।

उसमें उन्होंने लिखा था कि आकाश परिवार के लिए कितनी मेहनत करता है।

हमारे बीच होने वाले छोटे-छोटे झगड़ों से उन्हें कितना दुख होता था।

और जब हम खुश होते थे, तो वह अंदर से कितने खुश होते थे।

यहाँ तक कि उन्होंने मेरे व्यवहार में आए बदलावों को भी नोट किया था।

मैं डायरी के पन्ने पढ़ती गई…

और मेरी आँखों से आँसू बहते गए।

उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं जिस चीज़ की तलाश बाहर कर रही थी, वह मेरे अपने घर में मौजूद थी।

मेरा परिवार।

मेरे पति का विश्वास।

मेरी बेटी का भविष्य।

और मेरे ससुर का निस्वार्थ प्रेम।

कुछ देर बाद उन्होंने डायरी बंद की और गंभीर आवाज़ में कहा—

“मेरी शर्त सिर्फ इतनी है कि अब ऐसा जीवन जियो, जिसके तुम लोगों को गर्व हो।”

उन्होंने आगे कहा—

“आकाश ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ छोड़ा है। उसके विश्वास को दोबारा मत तोड़ना।”

“और अपनी बेटी के लिए ऐसी माँ बनो, जिससे वह बड़ी होकर सीख सके कि गलती होने के बाद इंसान खुद को बदल भी सकता है।”

उनकी बातें मेरे दिल में उतर गईं।

उस रात मैंने समीर से हमेशा के लिए सारे संबंध खत्म कर दिए।

मैंने अपने परिवार को फिर से अपना पूरा समय देना शुरू किया।

धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।

एक साल बाद हमने मिलकर एक छोटी-सी किराने की दुकान शुरू की।

आकाश दुकान संभालते और मैं घर और दुकान दोनों में उसका साथ देती।

हम मुश्किलों में भी साथ रहने लगे।

एक दिन आकाश ने मेरा हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा—

“धन्यवाद… मेरी जीवनसंगिनी।”

उनके ये शब्द सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं।

मैं सोचने लगी…

शायद उन्हें कभी मेरी गलती के बारे में पूरी सच्चाई पता नहीं चली।

लेकिन शायद उन्होंने मेरे अंदर आया बदलाव जरूर महसूस किया था।

आज भी जब मैं उस रात को याद करती हूँ, तो मेरे दिल में अपने ससुर के लिए सिर्फ सम्मान होता है।

उन्होंने मुझे अपमानित नहीं किया।

उन्होंने मेरा घर तोड़ा नहीं।

उन्होंने मुझे एक मौका दिया…

और मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती का एहसास कराया।

कभी-कभी जिंदगी हमें सज़ा देकर नहीं…

बल्कि एक मौका देकर बदलती है।

और उस रात मेरे ससुर ने मुझे वही मौका दिया था।

मैं गलत रास्ते से वापस लौट आई।

और मेरा परिवार…

पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गया।
#अवैधसंबंध #परिवार

सबसे ज़्यादा इंटरैक्ट करने और हफ़्ते की मेरी एंगेजमेंट लिस्ट में जगह बनाने के लिए धन्यवाद! 🎉 Hathi Singh, Shrirang Bhaga...
06/10/2026

सबसे ज़्यादा इंटरैक्ट करने और हफ़्ते की मेरी एंगेजमेंट लिस्ट में जगह बनाने के लिए धन्यवाद! 🎉 Hathi Singh, Shrirang Bhagat, MadanLal Sharma, Bhagwansingh Rathore, M R Rahar, Suraj Kumawat, Ramsamujh Yadu Ramsamujh, Baij Nath Sarswat, Rajender Kundu, Jj Chauhan, Jaichand Dhaker, Aravid Zala, Sawar Lal Mewada, Deepak Kumar Soni, Akhtar Khan, India Ham, ताजेग् पटेल दलजीपटेल, Rampalmor Mor, Ramjee Ram, Shriram Soni, Satya Narayan Sharma, सतीश सोमवंशी, आसामितत ठकर

द्रोपदी यमुना स्नान के लिए गई । नहाते समय उसकी दृष्टि कुछ दूर स्नान करते एक साधु पर पड़ी। उनके शरीर पर केवल एक लंगोटी मा...
05/10/2026

द्रोपदी यमुना स्नान के लिए गई । नहाते समय उसकी दृष्टि कुछ दूर स्नान करते एक साधु पर पड़ी। उनके शरीर पर केवल एक लंगोटी मात्र थी।दूसरी लंगोटी बदलने के लिए किनारे पर रखी थी। पर हवा का झोंका आया और वह दूसरी लंगोटी उड़कर पानी में बह गई। दुर्भाग्य से भीगी हुई लंगोटी भी पुराने होने के कारण उसी समय फट गई । तन ढकने में भी अड़चन खड़ी हो गई ।

प्रकाश फैलने लगा था। स्नान करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। साधु का असमंजस बढ़ा। वह निर्लज्ज बनकर कैसे खड़ा रहे? उसने कुछ दूर पर उगी एक छोटी सी झाड़ी के नीचे अपने को छिपा लिया। जब रात हो जाए तब अंधेरे में अपने स्थान पर जाने का उसका इरादा था।

द्रोपदी ने यह सारा दृश्य देखा और साधु की कठिनाई को समझा। उसने सहायता करने की बात सोची। उसके पास दूसरी धोती न थी। सो, आधी फाड़ कर अपना शरीर किसी प्रकार ढक लिया और से आधी को लेकर उस झाड़ी के समीप पहुंची जहां निर्वस्त्र साधु छिपा हुआ था।

द्रोपदी बोली- पिताजी! आपकी कठिनाई को मैंने समझा है। अपनी आधी साड़ी फाड़ कर लाई हूं। इससे आप अपना तन ढकें और घर चले जाएं। आधी से मेरा भी काम चल गया है।

साधु की आंखों में आंसू आ गए। उसने कपड़े के टुकड़े को ले लिया,पहना और घर चला गया। मन ही मन आशीर्वाद देता गया कि, भगवान सदा तुम्हारी लज्जा को ढके रहे।

बात बहुत पुरानी हो गई। द्रोपदी को पांडव जुंए में हार गए। दुशासन उसे भरी सभा में निर्वस्त्र करने के लिए उतारू हो गया। द्रोपदी के अपशब्दों का बदला लेने के लिए वही सूझ सूझी थी।

द्रोपदी ने इस विकट संकट में भगवान को पुकारा, जो शेष शैया पर सोए थे। नारद ने उन्हें जगाकर कहा -भक्तों की पुकार सुनिए। उसकी सहायता का प्रबंध कीजिए !

उनीदी आंखों से भगवान ने कहा- "ना मैं किसी की सहायता करता हूं, ना हैरानी में डालता हूं। सभी अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। द्रोपदी का कोई पिछला पुण्य हो तो पता लगाओ। उसके पुण्य होंगे तो बदला मिल जाएगा।"

नारद ने हिसाब की बही देखी, विदित हुआ कि द्रोपदी ने किसी साधु को अपनी आधी साड़ी फाड़ कर दान दी थी। वह टुकड़ा अब ब्याज समेत बढ़ते बढ़ते गट्ठे जितना हो गया है।

भगवान ने कहा -हम किसी के पुण्य का प्रतिफल समय पर क्यों नहीं देंगे?

गरुड़ पर चढ़कर वस्त्रों का गट्ठा लिए कौरवों की सभा के समीप पहुंचे। दुशासन वस्त्र खींचता गया। भगवान ऊपर से उसकी पूर्ति करते गए। खींचने वाला थक गया। वस्त्र बढ़ता रहा,द्रोपदी की लाज बच गई । उसे आधी साड़ी के बदले हजारों गज कपड़ा मिल गया ।

तो यदि मनुष्य का स्वयं कुछ किया ना हो, तो स्वयं विधाता भी उसकी सहायता नहीं कर सकता
#द्रोपदी

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