Maa Janki Farms Farmer's Producer Company Limited

Maa Janki Farms Farmer's Producer Company Limited आधुनिक खेती उन्नत किसान
सबका साथ सबका विकास

12/12/2022

पपीता से पापेन निकालकर करें अच्छी कमाई आइये जानते है की पपेन क्या है एवम इसे कैसे तैयार करते है ?

डॉ. एसके सिंह
प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक( प्लांट पैथोलॉजी)
एसोसिएट डायरेक्टर रीसर्च
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय
पूसा , समस्तीपुर बिहार
[email protected]/[email protected]

पपीता का वैज्ञानिक नाम कॅरिका पपया ( carica papaya ) है। इसकी फेमिली केरीकेसी ( Caricaceae ) है। इसका औषधीय उपयोग होता है। पपीता स्वादिष्ट तो होता ही है इसके अलावा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। सहज पाचन योग्य है। पपीता भूख और शक्ति बढ़ाता है। यह प्लीहा, यकृत को रोगमुक्त रखता और पीलिया जैसे रोगाें से मुक्ती देता है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग का होता है और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। इसके कच्चे और पके फल दोनों ही उपयोग में आते हैं। कच्चे फलों की सब्जी बनती है। इन कारणों से घर के पास लगाने के लिये यह बहुत उत्तम फल है।
इसके कच्चे फलों से दूध भी निकाला जाता है, जिससे पपेन तैयार किया जाता है। पपेन से पाचन संबंधी औषधियाँ बनाई जातीं हैं। अत: इसके पक्के फल का सेवन उदरविकार में लाभदायक होता है। पपीता सभी उष्ण समशीतोष्ण जलवायु वाले प्रदेशों में होता है। उच्च रक्तदाब पर नियंत्रण रखने के लिए पपीते के पत्ते को सब्जी में प्रयोग करते है। पपीते में ए, बी, डी विटामिन और केल्शियम, लोह, प्रोटीन आदि तत्त्व विपुल मात्रा में होते है। पपीते से वीर्य बढ़ता है। त्वचा रोग दूर होते हैैं। ज़ख्म जल्दी ठीक होते है। मूत्रमार्ग की बिमारी दूर होती है। पाचन शक्ति बढ़ती है। मूत्राशय की बिमारी दूर होती है। खॉसी के साथ रक्त आ रहा हो तो वह रुकता है। मोटापा दूर होता है। कच्चे पपीता की सब्जी खाने से स्मरणशक्ती बढती है। पपीता और ककड़ी हमारे स्वास्थ्य केंद्र लिए उपयुक्त है
पपीता के हरे कच्चे फलों को खरोंचने से जो दूध निकला है; इसी को सूखाने से पपेन तैयार होता हैा यह पेप्सिन के समान प्रोटीन पचाने वाला इनंजाइम है । यघपि यह बहुत से औघोगिक कामों में प्रयोग होता है पर इसका प्रमुख उपयोग दवा के रूप में है ।
पपीते की बागवानी फलों के अतिरिक्त पपेन के लिए भी की जाती है। पपेन कच्चे पपीते के फल का सुखाया हुआ दूध है इसके विभिन्न उपयोग हैं । पपीते के औषधीय गुण इसी पपेन के कारण होते हैं क्योंकि यह पौधे के प्रायः प्रत्येक भाग में पाया जाता है; लेकिन सबसे अधिक कच्चे फलों के दूध में होता है । पपेन का आर्थिक उपयोग खाध पदार्थो; खास कर माँस को गलाने; टयूना मछली के कलेजे से तेल निकालने में अधिक होता है। स्नो क्रीम और दन्त मंजन जैसे सौन्दर्य प्रसाधनों को बनाने; रेशम और रेयान से गोंद निकालने; उनको सिकोडने; चमडे के संसाधन और शराब के कारखानों में काफी उपयोग होता है। यह बहुत से रोग जैसे उतकक्षय; अजीर्ण; पाचन संवंधी रोगों में गोल कृति संक्रमण; चमडों के धब्बे मिटाने; गुर्दे की बीमारियों के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है । उचित ढंग से पपेन के लिए पपीते की बागवानी करना काफी लाभदायक होगा ।
पपेन निकालने की विधि काफी सरल है। पपेन के लिए पपीते की बागवानी वैसे ही की जाती है जैसे फल लेने के लिए। पपेने को हरे कच्चे फल से निकाला जाता है । इसके लिए आधे से तीन चैथाई विकसित फलों फल लगने के 70-100 दिन बाद का चयन करना चाहिए। दूध निकालनेके लिए फल पर लम्बाई में 0.3 सें0 मी0 गहरे एक बार में चार चीरे सुबह 10 बजे से पहले लगाते हैं । चीरे पूरे फल पर लगभग समान दूरी पर लगाना चाहिए। चीरे किसी स्टेनलेस स्टील के ब्लेड या तेज चाकू से लगाते हैं। चीरे लगाते ही फल की सतह पर सफेद दूध निकलने लगता है; जिसे धातु के बर्तन में इकट्ठा न करके किसी उचित चीनी मिट्टी ; कांच के बर्तन में करना एकत्र करना चाहिए । चीरे के कुछ समय बाद तक दूध बहता रहता है और बाद में फल की सतह पर कुछ जम जाता है। उसे भी खुरच कर इकटठा कर लेना चाहिए । चीरे लगाने की क्रिया 2-3 बार 3-4 दिन के अन्तर पर करना चाहिए । इस तरह प्रत्येक फल में 12 से 16 दिन के अन्तर पर 3-4 बार चीरे लगाए जा सकते हैं . इस बीच में लगभग फल का सम्पूर्ण दूध निकल आता है। उत्तम प्रकार का पपेन बनाने के लिए दूध इकट्ठा करने के बाद सुखा लेना चाहिए। जल्दी सुखाने के लिए दूध का पानी किसी उचित चीज से दबाव डालकर निकाल दिया जाता है।
यह सीधे धूप में या ताप चालित ओवन में 50-55 डिग्री से0 ग्रे0 तापमान पर सुखाया जाता है । तरल दूध में सुखाने से पहले 0.05 प्रतिशत पोटेशियम मेटा-बाई सल्फाइट मिलाने से इसका भण्डारण कुछ हद तक बढ जाता है। सुखाने की क्रिया तब तक जारी रखते हैं; जब तक पदार्थ शल्क के रूप में न आनेलगे । अधिक ताप या अधिक तेजी से सुखने पर पपेन का गुण खराब हो जाता है । अतः इस क्रिया को नहीं अपनाना चाहिए । निर्वात में सुखने से काफी अच्छा पपेन बनता है । सूखे हुए दूध को पीसकर बारीक चूर्ण में परिवर्तित कर लेते हैं और 10 मेश की छन्नी से छान लेते हैं। इस तरह तैयार किए हुए चूर्ण को हवा बन्द बोतलों में भर कर सील कर देते हैं। पालीथीन की थैलियां इस काम के लिए उत्तम पाई गई हैं। इस तरह की बहुत सी थैलियों को एक बडे टिन में भंडारण या परिवहन के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
प्रतिवर्ष पपेन की पैदावार फलों की संख्या और आकार; बागवानी का तरीका और जलवायु अत्यादि बातों पर निर्भर करती है; पूर्ण विकसित फलों से अपूर्ण विकसित या कच्चे फलों की तुलना में अधिक दूध निकलता है । प्रायः अंडाकार फलों से गेाल या लम्बे फलों की तुलना में अधिक पपेने मिलता है । साधारणतया 250-300 कि0 ग्रा0 प्रति हैक्टर प्रथम वर्ष और इसकी आधी उपज द्वितीय वर्ष में अच्छी मानी जाती है । तृतीय वर्ष में उपज इतनी धट जाती है कि पपेन के लिए बगीचा रखना लाभकारी नहीं होता।
पपेन बनाने के लिए फलों से दूध इकट्ठा करने से उनके पकने एवं स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पडता है। चीरा लगाने से फलों का बाहरी रूप विगड जाता है जिससे बाजार में कम दामों पर बिकता है। इस तरह के फलों को डिब्बाबन्दी या जैम;जैेली;कैंडी ; टाॅफी इत्यादि लाभप्रद वस्तुओं के रूप में परिरक्षित किया जा सकता है। इनसे टूटी फूटी भी बनाई जाती है।
पपेन तने; पत्तियाॅ एवं डंठलों के रस को अमोनियम सल्फेट संतष्प्ती या एल्कोहल कर्षण क्रियाओं दारा निकाल कर भी बनाया जा सकता है । इस तरह से बनाए हुए पपेन की एन्जाइम क्रिया वैसी ही होती है; जैसी कि फलों से बनाए हुये। पपीते की किस्म पूसा मजेस्टी; कोयम्बटूर-2 और कोयम्बटूर-5 में पपेन की मात्रा काफी होती है। इससे प्रतिवर्ष प्रति पौधा लगभग 300-400 ग्रा0 पपेन पैदा होता हैे जो अन्य किस्मों से अधिक है।
पपेन अन्तराष्ट्रीय बाजारों में मुख्य रूप से श्रीलंका, पूर्वी अफ्रीका और कांगों से आता है। भारत से भी इसका निर्यात होता है। पपेन खरीदने वाले मुख्य देश अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी जर्मनी और स्वीटजरलैण्ड हैं।

03/11/2022
15/10/2022

केला की खेती में अवांछित सकर (प्रकन्द) की कटाई समय समय पर करना अत्यावश्यक ,वरना उपज पर पड़ेगा प्रतिकूल प्रभाव

प्रोफ़ेसर (डा.) एस. के. सिंह
प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना (फल) एवम्
सह निदेशक अनुसंधान
डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय , पूसा , समस्तीपुर , बिहार
Give feedback [email protected]/[email protected]

हिन्दी में एक कहावत है कि “केला रहे हमेशा अकेला” इस पंक्ति के अनुसार केला की अच्छी एवं आर्थिक दृष्टि से लाभदायक उपज प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि मातृ पौधे के आस-पास उग रहे अवान्छित केला के छोटे छोटे पौधों को हटाते रहना चाहिए। लगभग 45 दिन में एक बार इस अवान्छित पौधों को काटते रहना एक सामान्य प्रक्रिया है, दो-तीन माह के केला के बाग में उग रहे पौधों को किसी तेज धार के चाकू से काटते रहना चाहिए। बेहतर होगा कि हम इन पौधों के साथ-साथ इनके प्रकन्दों को भी काटते रहें। लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मातृ पौधे को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचे । प्रकन्दों के कटे भाग के मध्य पर 4 मीली लीटर मिट्टी का तेल (किरासन तेल) भी डालना चाहिए। जब तक मातृ पौधे में फूल न आये तब तक किसी भी अधोभूस्तारी को आगे वृद्धि नही होने देना चाहिए। जब मातृ पौधे में गहर (घौंद) निकल आयें उस समय दूसरे अधोभूस्तारी को आगे वृद्धि करने देना चाहिए। मातृ पौधे का फल तोड़ने के बाद , उस समय पहला अधोभूस्तारी जो 5 माह का होता है, मातृ पौधे का स्थान ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार से 6-6 महीने बाद एक-एक अधोभूस्तारी की वृद्धि करके इसकी बहुवर्षीय फसल को नियमानुसार किया जा सकता है। ऐसा करते रहने से केला के प्रकन्दों के मध्य आन्तरिक प्रतिस्पर्धा नहीं होती है।। परिणाम स्वरूप बड़ी, गुणवत्तायुक्त घौद, कम समय में प्राप्त होती हैं।

15/10/2022

नींबू में फल झड़ने की समस्या को
कैसे करें प्रबंधित ?

डॉ. एसके सिंह
प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक( प्लांट पैथोलॉजी) एवं
एसोसिएट डायरेक्टर रीसर्च
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय
पूसा , समस्तीपुर बिहार
[email protected]/[email protected]

वैसे से तो नींबू में कई तरह की समस्याएं,इसकी सफल खेती को प्रभावित करती है।उन्ही समस्यायों में से नींबू वर्गीय फलों की सबसे बड़ी समस्या है फलों का झड़ना। फूल और फलों का गिरना मुख्य रूप से अंडाशय के निष्क्रिय होने, निषेचन क्रिया न होने तथा पोषक तत्वों की कमी एवं नमी की कमी अथवा तापक्रम के उतार-चढ़ाव के कारण होता है। परिणाम स्वरूप मात्र 8-10 प्रतिशत फूल ही फल के रूप में विकसित हो पाते हैं।
इस चित्र में दिख रही अवस्था में बहुत कुछ नही किया जा सकता है। इस तरह की समस्या को रोकने के लिए आवश्यक है की फूल में फल बनने (कंप्लीट फ्रूट सेटिंग) के बाद साफ नामक फफुंदनाशक की 2ग्राम को प्रति लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें एवं 100 ग्राम सोलुवर प्रति वयस्क पेड़ में खाद एवं उर्वरकों की सस्तुति मात्रा के साथ मुख्य तने से 1मीटर दूर रिंग बना कर दे या घुलनशील बोरोन की 4 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करने से फल के झड़ने की समस्या में भारी कमी आती है।

14/10/2022

सिट्रस कैंकर , नींबू की सबसे घातक जीवाणुजनित बीमारी कैसे करें प्रबंधन ?

डॉ. एसके सिंह
प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक( प्लांट पैथोलॉजी)
एसोसिएट डायरेक्टर रीसर्च
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय
पूसा , समस्तीपुर बिहार
[email protected]/[email protected]

एसिड लाइम किस्म साइट्रस कैंकर के लिए अतिसंवेदनशील है। उपज की हानि किस्म के आधार पर 5 से 35 प्रतिशत के बीच होती है। यह रोग छोटे पौधों के साथ साथ बड़े हो चुके पेड़ों पर हमला करता है। नर्सरी में युवा पौधों में, रोग गंभीर क्षति का कारण बनता है। बुरी तरह से रोग से आक्रांत पत्तियाँ नीचे गिर जाती हैं और गंभीर प्रकोप में पूरा पौधा मर जाता है। रोग पत्तियों, टहनियों, कांटों, पुरानी शाखाओं और फलों को प्रभावित करता है। पत्तियों पर रोग सबसे पहले एक छोटे, पानीदार, पारभासी पीले रंग के धब्बे के रूप में प्रकट होता है। जैसे-जैसे धब्बे परिपक्व होते हैं, सतह सफेद या भूरे रंग की हो जाती है और अंत में केंद्र में टूटकर खुरदुरी, सख्त, कॉर्क जैसी और गड्ढा जैसी दिखती है। संक्रमण उन फलों में फैलता है जिन पर धब्बे बन जाते हैं। कैंकर पूरी सतह पर बिखरे हो सकते हैं या कई कैंकर एक साथ एक अनियमित स्कर्फी द्रव्यमान का निर्माण कर सकते हैं।कैंकर को कभी भी बुरी तरह से रोगग्रस्त पेड़ों की जड़ों पर प्राकृतिक रूप से होते हुए नहीं देखा गया है। हालाँकि यह रोग अंगूर के फलों की जड़ों पर पाया गया है जो जमीन की सतह से ऊपर हैं।
साइट्रस कैंकर एक नीबू के सबसे महत्वपूर्ण रोगों में से एक रोग है जो जीवाणु ज़ैंथोमोनस एक्सोनोपोडिस के कारण होता है, यह जीवाणु मनुष्यों के लिए हानिकारक नहीं, यह नींबू के पेड़ों की जीवन शक्ति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है, जिससे पत्तियां और फल समय से पहले गिर जाते हैं। कैंकर से संक्रमित फल खाने के लिए सुरक्षित है, लेकिन ताजे फल के रूप में इसकी बिक्री में भारी कमी आती है बाजार में अच्छा मूल्य नहीं मिलता है।
साइट्रस कैंकर रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया रंध्रों के माध्यम से, या मौसम की क्षति या कीड़ों के कारण हुए घावों के माध्यम से पत्तियों में प्रवेश करते हैं, जैसे कि साइट्रस लीफ माइनर (फिलोकोनिस्टिस सिट्रेला)। युवा पत्ते सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। लक्षण आमतौर पर बैक्टीरिया के संपर्क में आने के 14 दिनों के भीतर दिखाई देते हैं। जीवाणु पुराने घावों और पौधों की सतहों पर कई महीनों तक व्यवहार्य रहते हैं। घावों से जीवाणु कोशिकाएं निकलती हैं, जो हवा और बारिश से फैल सकती हैं। भारी बारिश और तूफान जैसे हवा की घटनाओं से संक्रमण और फैल सकता है। लोग दूषित उपकरण, रोगग्रस्त पेड़ की कटिंग, अनुपचारित संक्रमित फल और संक्रमित पौधों को स्थानांतरित करके बीमारी को फैलाने में सहायक होते हैं। यह रोग उच्च वर्षा और उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में ज्यादा पनपता है। वैसे तो नींबू की सभी प्रजातियां साइट्रस कैंकर के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं,लेकिन यह रोग सर्वाधिक कागजी नींबू में पाया जाता है।

सिट्रस कैंकर रोग का प्रबंधन कैसे करे ?

रोग से ग्रसित गिरे हुए पत्तों और टहनियों को इकट्ठा करके जला देना चाहिए। नए बागों में रोपण के लिए रोग मुक्त नर्सरी स्टॉक का उपयोग किया जाना चाहिए।नए बागों में रोपण से पहले पौधों को ब्लाइटॉक्स 50 की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में एवं स्ट्रेप्टोसाइकिलिन की 1 ग्राम मात्रा को प्रति 3 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाना चाहिए।
पुराने बागों में मानसून की शुरुआत से पहले प्रभावित पौधों के हिस्सों की छंटाई और मौसम की स्थिति के आधार पर समय-समय पर ब्लाइटॉक्स 50 + स्ट्रेप्टोसाइकिलिन का छिड़काव रोग को नियंत्रित करता है।पत्तियों के हर नए फूल आने के तुरंत बाद ब्लाइटॉक्स 50 + स्ट्रेप्टोसाइकिलिन का छिड़काव करना चाहिए। उचित निषेचन और सिंचाई द्वारा पौधे की शक्ति को हमेशा बनाए रखना चाहिए। खाद इस तरह से करनी चाहिए कि इसका अधिकतम लाभ पौधे को मिले।

08/10/2022

फल,फूल एवं सब्जियों की नर्सरी में आने वाली सबसे बड़ी समस्या डैंपिंग ऑफ बीमारी (सीडलिंग अवस्था में) को कैसे करें प्रबन्धित ?

डॉ. एस.के .सिंह
प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक( प्लांट पैथोलॉजी) , एसोसिएट डायरेक्टर रीसर्च
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय
पूसा , समस्तीपुर बिहार
Give feedback [email protected]/[email protected]

इस समय किसान जाड़े के समय लगाए जाने वाले फल,फूल एवं सब्जी हेतु सीडलिंग को नर्सरी उगने में व्यस्त है ।इस समय उन्हें एक समस्या से दो चार होना पड़ रहा है , इस समस्या में छोटे पौधे(सीडलिंग) जमीन की सतह से गल कर गिर जा रहे है ,उन्हें समझ नही आ रहा है की क्या करे । इस समस्या को डैंपिंगऑफ कहते है।
डैंपिंग ऑफ नर्सरी में लगने वाली एक आम बीमारी है जो ज्यादातर नर्सरी में सब्जियों के बीज बोने की अवस्था में होती है। यह अंकुरों को बहुत जल्दी मार सकता है। यह रोग मृदा जनित कवक के कारण होता है और कई फसलों (नर्सरी में उगाई जाने वाली सभी जैसे कोल फ़सल, टमाटर और मिर्च,पपीता,गेंदा का फूल इत्यादि जिसकी भी नर्सरी तैयार करते है ) पर हमला करता है। तने पर लक्षणों में जमीनी स्तर पर भूरे पानी के धँसे हुए घाव शामिल हैं। धीरे-धीरे तना या जड़ें सड़ जाती हैं और अंकुर जमीन की सतह पर गिर जाता है और मर जाता है।
उच्च घनत्व, उच्च आर्द्रता और उच्च तापमान में नर्सरी में उगाए लगभग सभी फल,फूल,एवं सब्जी के अंकुर के समय होने वाले प्रमुख रोगों में से एक हैं। जब पौधे बड़े हो जाते हैं तो वे इस रोग के प्रति अधिक प्रतिरोधी हो जाते हैं और नियंत्रण के उपाय अनावश्यक होते हैं।

नर्सरी में लगने वाली डैंपिंगऑफ बीमारी को कैसे करें प्रबन्धित?

नर्सरी में उपयोग करने से पहले औजारों को खूब अच्छी तरह से साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। अच्छे हवादर (वातन) के साथ धूप वाले क्षेत्र को नर्सरी बेड हेतु चयन करें। सुनिश्चित करें कि नर्सरी बेड अच्छी तरह से सूखा रहे।सर्वोत्तम उत्पादन के लिए किसानों को मूल बातें सही करनी चाहिए.यदि संभव हो तो सीडलिंग सीड ट्रे या जिसे प्रो ट्रे भी कहते है उसमे उगाए। इससे लगाने से उन्हें उचित गणना में मदद मिलेगी और उचित प्रबंधन में भी मदद मिलेगी ।इसके अलावा ट्रे बारिश के दौरान या अन्य किसी प्रतिकूल मौसम की स्थिति को नियंत्रित करने में मदद करती है।नर्सरी बेड में मिट्टी को सूर्य की धूप से निर्जमीकृत (सॉयल सोलराइजेशन) करें। तैयार नर्सरी बेड को गीला करें फिर सफेद प्लास्टिक (250-300 गेज) से ढक दें ताकि यह 21 दिनों तक एयर टाइट रहे। फिर, प्लास्टिक हटा दें और नर्सरी बेड को 3 दिनों तक के लिए खुला छोड़ दें। सदैव उपचारित बीजों का ही प्रयोग करें। बीज का उपचार ट्राइकोडरमा @10ग्राम ट्राइकोडरमा /लीटर पानी की दर से करें।यदि बीजों को उपचारित नहीं किया गया है, तो उन्हें कार्बेन्डाजिम @ 2 ग्राम / किग्रा बीज के साथ एक कंटेनर में रखें, ढक्कन बंद करें और अच्छी तरह से हिलाएं,इस प्रकार से बीजों को उपचारित करें। पौधो को घना होने से बचाने के लिए पंक्ति से पंक्ति के बीच अंकुर की दूरी 10 सेमी और पौधे से पौधे के बीच 2 सेमी रखें। कमजोर और अस्वस्थ पौध को हटा दें। यदि डैंपिंगऑफ रोग के लक्षण दिखाई दें तो रिडोमिल+मैनकोजेब युक्त फफुंदनाशक दवा @ 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव नर्सरी की पौध में करें।
फफुंदनाशक / कीटनाशक का उपयोग करते समय, हमेशा सुरक्षात्मक कपड़े पहनें और उत्पाद लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें, जैसे कि खुराक,प्रयोग का समय इत्यादि।

03/10/2022

Address

Bachhwara
851128

Telephone

+917654276556

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Maa Janki Farms Farmer's Producer Company Limited posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Maa Janki Farms Farmer's Producer Company Limited:

Share