10/01/2026
॥श्री सुरभ्ये नमः॥
॥जयगोमाता जयगोपाल॥
*॥श्री कामधेनु कृपा प्रसाद॥*
*॥ गाय किसे कहते हैं ? ॥*
*॥ भग ~ १ ॥*
सज्जनों ! हमें गो के संरक्षण , संवर्धन और गोउत्पादों के विनियोग से पहले यह समझना होगा की गाय क्या है ?
आज तो भाई पता नहीं कैसे-कैसे पशुओं का नाम गाय रख दिया है । समझ से बाहर की बात है । गाय शब्द जो है , वेद से और स्मृति से मिला है । हमारे वेदों ने , स्मृतियों ने , हमारे पूर्वजों ने , जिसको गाय कहा है , उस गाय का स्वरूप हम लोगों को समझना खूब आवश्यक है । गाय के रिढ़ की हड्डी में एक नाड़ी होती है , जिसका नाम है सुर्यकेतु नाड़ी । यह सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य से सम्बन्ध रखती है । गाय की थुई ( कुकुद ) जो होता है , ठीक उसके और रीढ़ की हड्डी के संधि में ही यह नाड़ी रहती है । इस नाड़ी का सम्बन्ध सूर्य से होता है । सूर्य की तीन प्रधान किरणों है । एक किरण तो समुद्र के खारे जल का शोषण करके ऊपर क्षोभमण्डल में ले जाती है और उसको मीठा बनाकर पुनः पृथ्वी पर बरसाती है । दूसरी किरन सम्पूर्ण प्राणियों को ओज प्रदान करती है। तीसरी गो किरण इसका नाम ही गो है और यह गो किरण सीधी सूर्यकेतु नाड़ी के माध्यम से गाय में उतरती है । यह सूर्यकेतु नाड़ी एक तहर से उस गो किरण को पकड़ने , आकर्षित करने तथा ग्रहण करने का एक यंत्र है । गो किरण के द्वारा गाय के शरीर में स्वर्णयुक्त क्षार का निर्माण होता है जिसे स्वर्णपित्त क्षार कहते है । यह स्वर्णपित्त क्षार ही वह तत्व है जिसके किरण गाय को परम पवित्र , सत्व की सृजक , मांगलिक और कल्याणकारी माना गया है । यह केवल थुई वाली गाय के शरीर में ही होता है और वास्तव में वेदलक्षणा गोमाता वही है , गाय उसी का नाम है और किसी का नाम गाय नहीं है । एक विशेषता और जो गाय के बाहरी लक्षणों में दिखती है वो यह है कि गाय गाय के गले के नीचे एक बड़ी गल कम्बल लटकती है । यों तो आदमी को कोई मारता-पीटता है तो घबराया हुआ वह भी छूटने के लिए कह देता है कि में तुम्हारी गाय हूँ । पर गाय तो केवल वही है जिसके पीठ पर बड़ी थुई हो , गले के नीचे गल कम्बल हो तथा शरीर में स्वर्णपित्त क्षार बने। वह स्वर्णपित्त क्षार गोबर , गोमूत्र , दूध , दही , घी आदि के माध्यम से आप हम सब लोगों को प्राप्त होता है ।
हॉलिस्टीन व जर्सी जिनको हम गाय नहीं कह सकते पर अंग्रेजी में काउ-काउ जैसा कुछ नाम है । हमारे यहाँ राजस्थान में काउ कुत्ते को कहते हैं । छोटा बच्चा जब चलता है और इधर-उधर जाने का प्रयास करता है तो उसको थोड़ा भय दिखाते है की देखो काउ आयेगा , काट लेगा तुमको बाहर मत जाना । तो हमे लगता है की कुत्ते जैसे किसी प्राणी के सम्पर्क से इस पशु की उत्पत्ति हुई है । यह जब नाराज होता है तक मुख से काटता है । ऐसे काटता है जिस तरह कुत्ता काटता है । यह गाय नहीं है । देशी गाय के घी के नाम से इसके घी का उपयोग करते हो तो यह आपकी इचा है , पर यह गाय का दूध , गाय का घी नहीं है । घी उसी का नाम है जिससे जीवनी शक्ति का निर्माण हो , सात्विक शक्ति का सृजन हो । दूध उसी का नाम है जो हमारे तन, मन और मस्तिष्क में सत्व को विकसित करे , गोबर उसी का नाम है जो विषाणुओं और कीटाणुओं को नष्ट करे ।
*॥जयश्रीकामधेनुकृष्ण॥*