Apan mithila

Apan mithila jai mithila jai maithalli

14/04/2026

"सौभाग्य और पुण्य की अधिष्ठात्री *'वरूथिनी एकादशी'* की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

भगवान मधुसूदन आपके जीवन के सभी कष्टों का हरण कर आपको सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करें।
*जय श्री कृष्ण! ✨🙏"

सभी 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा!एक ऐतिहासिक फैसले में प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मदुरै ने सत्तनकुलम कस्...
07/04/2026

सभी 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा!
एक ऐतिहासिक फैसले में प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मदुरै ने सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ केस में सभी 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई है। इंस्पेक्टर एस श्रीधर, सब-इंस्पेक्टर पी रघु गणेश और के बालकृष्णन, हेड कॉन्स्टेबल एस मुरुगन और ए सामिदुरई, तथा कॉन्स्टेबल एम मुथुराजा, एस वेल मुथु, एस चेल्लादुरई और एक्स थॉमस फ्रांसिस, इन सभी को दोहरे हत्याकांड का दोषी पाया गया।

19 जून 2020 को 59 वर्षीय जयराज अपने बेटे की मोबाइल दुकान पर गए थे। पुलिस ने कोविड नियमों के उल्लंघन के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जब उनके बेटे बेनिक्स (31 वर्ष) अपने पिता को छुड़ाने थाने पहुंचे, तो पुलिस से उनकी बहस हो गई। इसके बाद पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया और दोनों को पूरी रात बेरहमी से प्रताड़ित किया।

22 जून 2020 को बेनिक्स की Kovilpatti Government Hospital में मौत हो गई, जबकि अगले दिन Jeyaraj ने दम तोड़ दिया। जांच में सामने आया कि मोबाइल दुकान तय समय से ज्यादा खुली ही नहीं थी, यानी केस झूठा था। इस मामले में महिला कॉन्स्टेबल ने आगे आकर सच्चाई बताई। उन्होंने खुलासा किया कि पिता-पुत्र को रातभर बुरी तरह पीटा गया और उनके ही कपड़ों से थाने में फैला खून साफ करवाया गया। पोस्टमार्टम में सामने आया कि Beniks के शरीर पर 13 और Jeyaraj के शरीर पर 17 गंभीर चोटें थीं, जो उनकी मौत का कारण बनीं।

सोशल मीडिया और देशभर में विरोध के बाद मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। पूरा केस बताता है कि यह घटना महज पुलिस के अहंकार की वजह से हुई क्योंकि बेटे ने अपने पिता की गिरफ्तारी पर सवाल उठाया था।

सनातन संस्कृति के अप्रतिम रक्षक, राष्ट्रधर्म के उपासक 'हिंदवी स्वराज' के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर उन्ह...
19/02/2026

सनातन संस्कृति के अप्रतिम रक्षक, राष्ट्रधर्म के उपासक 'हिंदवी स्वराज' के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। 💐💐💐
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या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः🌼📖🙇🏻‍♂🚩*विद्या की देवी माँ सरस्वती की पू...
23/01/2026

या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः🌼📖🙇🏻‍♂🚩

*विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा के पावन पर्व 'बसंत पंचमी' की हार्दिक शुभकामनाएं!*🙏💐

विद्या की देवी माँ सरस्वती हम सभी को ज्ञान, ऊर्जा, समृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें ऐसी मंगलकामना।✨🧡🙌🏻

न्यायपालिका के गर्भ में बुर्के की आर में ढकी छुपी इज्जत आबरू मर्यादा और विश्वास का जो मजबूत कवच् था अब वो बेआबरू हो गया ...
21/11/2025

न्यायपालिका के गर्भ में बुर्के की आर में ढकी छुपी इज्जत आबरू मर्यादा और विश्वास का जो मजबूत कवच् था अब वो बेआबरू हो गया है; सरेराह नंगा हो गया है!!
गलीच् कारनामे से बदबू आ रही हैं?
बस एक किताब का डर है।
फटती है किताब में लिखे किसी लाईन पर टिप्पणी करने से।
हिन्दू अपनी किताबों की इज्जत नहीं करते।
कोई जलाता है,
कोई फाड़ता है
कोई गंदी टिप्पणी करता है और हम सहते रहते हैं।
उनकी किताब पर कोर्ट में भी टिप्पणी करने का साहस नहीं है

रास्ते २ है लोकतांत्रिक तरीका अपनाएं या फिर ऊपरी न्यायपालिका को नए सिरे से निर्माण किया जाय?
जहरीले कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करे बिना ये सुधरने वाले नहीं हैं।
विभिन्न मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपने निर्णय बदल चुका है। यहां तक कि पूर्व डीवाई चंद्रचूड़ भी उस निर्णय को बदल चुके हैं जो उस पीठ ने दिया था, जिसमें उनके पिता जी शामिल थे।
आज राष्ट्रपति के अधिकारों पर कोर्ट के कब्जे से पीछे हटने का फैसला भी सुप्रीम कोर्ट की पिछले फैसले के पीछे की मानसिकता दर्शाता है. ...

हमारी न्यायपालिका आइये देखते हैं:

1. सुप्रीम कोर्ट ने मुर्शिदाबाद हिंसा की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया

बंगाल में राष्ट्रपति शासन की मांग पर कहा कि हम कार्यपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकते जबकि तमिलनाडु विधेयक मामले में राष्ट्रपति को 3 महीने में निर्णय लेने का आदेश देते हैं

2. जब हिंदू पक्ष वक्फ बोर्ड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गया जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट जाओ, हिंदू पक्ष की 140 याचिकाएं अलग-अलग हाईकोर्ट में घूम रही हैं

जब नए वक्फ कानून के खिलाफ मुस्लिम पक्ष SC गया तो जज साहब ने हाईकोर्ट नहीं भेजा बल्कि खुद ही सुनवाई कर रहे हैं

3. राम मंदिर पर सुनवाई: कोर्ट को प्रमाण और कागज चाहिए
काशी ज्ञानवापी पर सुनवाई: कोर्ट को प्रमाण और कागज़ चाहिए
कृष्ण जन्मभूमि पर सुनवाई: कोर्ट को प्रमाण चाहिए

वक्फ कानून सुनवाई: SC कहता है कि कुछ मस्जिदें 300-400 साल पुरानी हैं. वक्फ बोर्ड कागज कहां से लाएगा ?
4. अर्थात अगर मुसलमान किसी जगह पर नमाज आदि पढ़ते रहे हैं, इबादत करते रहे हैं तो वो जमीन मुस्लिम पक्ष की मानी जाए ? सरकार उनसे प्रमाण भी नहीं मांग सकती ?

लेकिन जब श्रीराम जन्मभूमि का मामला था तो सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्ष से प्रमाण मांगे कि साबित करो कि ये जमीन हिंदुओं की है या यहां राम मंदिर ही था

5. हिंदू पक्ष ने स्कंद पुराण का संदर्भ, एडवर्ड स्तंभ और हंस बेकर का नक्शा प्रस्तुत कर यह साबित किया कि यह वही स्थान है जहां राम का जन्म हुआ था और इसके बाद हिंदू पक्ष ने केस जीता

लेकिन मस्जिदों के मामले में माननीय जज साहब कह रहे हैं कि 5 सदी पुरानी मस्जिद के कागज कहां से आएंगे ?

6. हिंदू पक्ष ने काशी ज्ञानवापी मंदिर, धार के भोजशाला मंदिर, संभल के हरिहर मंदिर, कृष्ण जन्म भूमि मंदिर को लेकर तमाम प्रमाण और वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, लेकिन फिर भी SC और और स्थानीय न्यायालय हिंदुओं के पक्ष में फैसला नहीं दे रहे हैं और तारीख पर तारीख मिल रही है

वहीं वक्फ मामले में माननीय कोर्ट कह रहा है कि सैकड़ों साल पुरानी मस्जिदों के कागज कहां से लाए जा सकते हैं ?

अर्थात कागज देने के बाद भी हिंदुओं के पक्ष में फैसला नहीं और मुस्लिमों से कागज ही नहीं मांगे जा रहे ?

7. शेषमल एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में 14 मार्च, 1972 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और राज्य सरकार को मंदिरों के प्रबंधन और प्रशासन जैसे धर्मनिरपेक्ष कार्यों को विनियमित करने का अधिकार है, जिसमें पुजारियों की नियुक्ति भी शामिल है

वही कोर्ट कह रहा है कि वक्फ बोर्ड की नियुक्ति में हस्तक्षेप क्यों?
8. सबरीमाला मंदिर केस (2018)

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, यह इस मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा है लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हुए इस परंपरा को खत्म कर दिया, जिसके बाद वामपंथी महिलाओं ने मंदिर में फिजूल में प्रवेश किया

9. सबरीमाला मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं ने भी मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका को उतनी गंभीरता से नहीं लिया, जितनी सबरीमाला जनहित याचिका को लिया

सबरीमाला में महिलाओं को प्रवेश के पक्ष में निर्णय देने वाला माननीय कोर्ट वर्षों बाद भी मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश वाली याचिका पर निर्णय नहीं सुना सका है और इस मामले में नियमित सुनवाई भी नहीं हो रही है

10. ए.एस. नारायण दीक्षितुलु बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1996) और एन. अदित्यन बनाम त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड (2002) में सुप्रीम कोर्ट ने खुद कई बार यह स्पष्ट किया है कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित हैं और कौन-सी नहीं

कोर्ट ने यह भी कहा है कि किसी धार्मिक संस्था का प्रबंधन अनुच्छेद 26 के तहत नहीं आता

11. तो फिर सुप्रीम कोर्ट वक्फ बोर्ड (जो कि एक प्रबंधन संस्था है) में गैर-मुस्लिम की नियुक्ति पर सवाल क्यों उठा रहा है? सुप्रीम कोर्ट को अपनी ही पुरानी टिप्पणियों को पढ़ना चाहिए
लेकिन ठहरिए
उन सभी टिप्पणियों और निर्णयों को हिंदू मंदिरों के सरकारी नियंत्रण के संदर्भ में दिया गया था

12.
भारत में मंदिरों का नियंत्रण सरकार के हाथों में है. सरकार मंदिरों का धन लेती है और उसे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्यों में खर्च करती है.

वहीं, मस्जिदों और चर्चों को पूरी स्वतंत्रता दी जाती है. पिछले 10 वर्षों से हिंदू लगातार इस विषय पर ध्यान देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार सुप्रीम कोर्ट उन्हें हाई कोर्ट जाने की सलाह देकर पल्ला झाड़ लेता है....

13. पशु बलि और बकरीद

न्यायालय ने त्रिपुरा के मंदिर में पशु बलि पर प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि पशुओं के साथ क्रूरता नहीं होनी चाहिए

हालांकि माननीय कोर्ट ईद पर बकरी काटने से रोकने का आदेश नहीं दे सके हैं

बकरीद पर कटने वाली बकरियां चीख-चीख कर कह रही हैं कि जज साहब हमें बचाओ, लेकिन मंदिर में पशु बलि रोकने की तरह ईद पर बकरी को काटने से रोकने का आदेश नहीं आ सका है

14. यें तो केवल कुछ उदाहरण ही उजागर किए हैं, लेकिन ऐसे अनेक मामले हैं जहाँ सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) की व्याख्या असंगत और याचिकाकर्ता की धार्मिक पहचान से प्रभावित प्रतीत होती है।

इसका नतीजा यह है कि भारत में हिंदू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब सुप्रीम कोर्ट पर से अपना विश्वास खोता जा रहा है। वे न्यायपालिका से अपेक्षा करते हैं कि वह निष्पक्षता बनाए रखे और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान तथा तटस्थता का पालन करे।
तमाम उदाहरण कोर्ट की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। उम्मीद नहीं है कि कभी इन सवालों के जवाब कोर्ट से मिल पाएंगे क्योंकि वह सर्वोच्च है।

*यह एक दुर्लभ फोटो वर्ष 1995 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल के शपथग्रहण समारोह का है.... जरा ध्यान से द...
08/11/2025

*यह एक दुर्लभ फोटो वर्ष 1995 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल के शपथग्रहण समारोह का है.... जरा ध्यान से देखिए.... लालकृष्ण अडवानी व प्रमोद महाजन कुर्सी पर बैठे दिखायी दे रहे हैं..... उनके ठीक सामने जमीन पर दरी पर एक कार्यकर्ता बैठा है..... जो आज विश्व का सबसे चर्चित एव सम्मानित लीडर है ! आया पहचान में ? ये है असल लोकतंत्र का नमुना जिसमें कि एक सामान्य कार्यकर्ता भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकता है....... क्या किसी अन्य पार्टी में ये दम है की पार्टी प्रमुख के वंश के अलावे किसी और को उत्तराधिकारी घोषित कर दे......*
🙏🚩

लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के समापन की हार्दिक शुभकामनाएं।उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर इस सूर्य उपासना के महापर्व का ...
28/10/2025

लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के समापन की हार्दिक शुभकामनाएं।

उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर इस सूर्य उपासना के महापर्व का समापन हुआ।
जय सूर्य देव

सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने पर प्रकाशित किया गया 60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम गोडसे का अंतिम भाषण -      ...
24/10/2025

सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने पर प्रकाशित किया गया
60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम गोडसे
का अंतिम भाषण -
#मैंने_गांधी_को_क्यों_मारा !

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी लेकिन नाथूराम गोड़से घटना स्थल से फरार नही हुए बल्कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया,

नाथूराम गोड़से समेत 17 देशभक्तों पर गांधी की हत्या का मुकदमा चलाया गया इस मुकदमे की सुनवाई के दरम्यान #न्यायमूर्ति #खोसला से #नाथूराम जी ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर जनता को सुनाने की अनुमति माँगी थी जिसे न्यायमूर्ति ने स्वीकार कर लिया था पर यह कोर्ट परिसर तक ही सिमित रह गयी क्योकि सरकार ने नाथूराम के इस वक्तव्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन नाथूराम के छोटे भाई और गांधी की हत्या के सह-अभियोगी गोपाल गोड़से ने 60 साल की लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में विजय प्राप्त की और नाथूराम का वक्तव्य प्रकाशित किया गया l

#मैंने_गांधी_को_क्यों_मारा*

नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी
150 दलीलें न्यायलय के समक्ष प्रस्तुति की
नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के कुछ मुख्य अंश,

नाथूराम जी का विचार था कि गांधी की अहिंसा हिन्दुओं
को कायर बना देगी कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था महात्मा गांधी सभी हिन्दुओं से गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह अहिंसा के मार्ग पर चलकर बलिदान करने की बात करते थे नाथूराम गोड़से को भय था गांधी की ये अहिंसा वाली नीति हिन्दुओं को
कमजोर बना देगी और वो अपना अधिकार कभी
प्राप्त नहीं कर पायेंगे,

1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड
के बाद से पुरे देश में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ
आक्रोश उफ़ान पे था,

भारतीय जनता इस नरसंहार के #खलनायक_जनरल_डायर
पर अभियोग चलाने की मंशा लेकर गांधी के पास गयी
लेकिन गांधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन
देने से साफ़ मना कर दिया,

महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया महात्मा गांधी खुद को मुसलमानों का हितैषी की तरह पेश करते थे वो #केरल_के_मोपला_मुसलमानों द्वारा वहाँ के
1500 हिन्दूओं को मारने और 2000 से अधिक हिन्दुओं
को मुसलमान बनाये जाने की घटना का विरोध
तक नहीं कर सके,

कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में #नेताजी_सुभाष_चन्द्रबोस
को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गांधी ने #अपने_प्रिय_सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे गांधी ने सुभाष चन्द्र बोस से जोर जबरदस्ती करके इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया...
23 मार्च 1931 को भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी पूरा देश इन वीर बालकों की फांसी को
टालने के लिए महात्मा गांधी से प्रार्थना कर रहा था लेकिन गांधी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए देशवासियों की इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया,

गांधी #कश्मीर_के_हिन्दू_राजा_हरि_सिंह से कहा कि
#कश्मीर_मुस्लिम_बहुल_क्षेत्र_है_अत:वहां का शासक
कोई मुसलमान होना चाहिए अतएव राजा हरिसिंह को
शासन छोड़ कर काशी जाकर प्रायश्चित करने जबकि हैदराबाद के निज़ाम के शासन का गांधी जी ने समर्थन किया था जबकि हैदराबाद हिन्दू बहुल क्षेत्र था गांधी जी की नीतियाँ
धर्म के साथ बदलती रहती थी उनकी मृत्यु के पश्चात
सरदार पटेल ने सशक्त बलों के सहयोग से हैदराबाद को
भारत में मिलाने का कार्य किया गांधी के रहते ऐसा करना संभव नहीं होता
पाकिस्तान में हो रहे भीषण रक्तपात से किसी तरह से अपनी जान बचाकर भारत आने वाले विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली मुसलमानों ने मस्जिद में रहने वाले हिन्दुओं का विरोध किया जिसके आगे गांधी नतमस्तक हो गये और गांधी ने उन विस्थापित हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में सड़कों पर रात बिताने पर मजबूर किया गया,

महात्मा गांधी ने दिल्ली स्थित मंदिर में अपनी प्रार्थना सभा
के दौरान नमाज पढ़ी जिसका मंदिर के पुजारी से लेकर
तमाम हिन्दुओं ने विरोध किया लेकिन गांधी ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया लेकिन महात्मा गांधी एक बार भी किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ नहीं कर सके,

लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से विजय
प्राप्त हुयी किन्तु गान्धी अपनी जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया गांधी अपनी मांग
को मनवाने के लिए अनशन-धरना-रूठना किसी से बात
न करने जैसी युक्तियों को अपनाकर अपना काम
निकलवाने में माहिर थे इसके लिए वो नीति-अनीति का लेशमात्र विचार भी नहीं करते थे,

14 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था लेकिन गांधी ने वहाँ पहुँच कर
प्रस्ताव का समर्थन करवाया यह भी तब जबकि गांधी
ने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश
पर होगा न सिर्फ देश का विभाजन हुआ बल्कि लाखों
निर्दोष लोगों का कत्लेआम भी हुआ लेकिन गांधी
ने कुछ नहीं किया,

धर्म-निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के जन्मदाता महात्मा गाँधी ही थे जब मुसलमानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया तो महात्मा गांधी ने सहर्ष ही इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी की जगह हिन्दुस्तानी (हिंदी+उर्दू की खिचड़ी) को बढ़ावा देने लगे बादशाह राम और बेगम सीता जैसे शब्दों का
चलन शुरू हुआ,
कुछ एक मुसलमान द्वारा वंदेमातरम् गाने का विरोध करने
पर महात्मा गांधी झुक गये और इस पावन गीत को भारत
का राष्ट्र गान नहीं बनने दिया,

गांधी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी महाराणा प्रताप व
गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा वही दूसरी
ओर गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को क़ायदे-आजम
कहकर पुकारते था,

कांग्रेस ने 1931 में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र ध्वज बनाने के
लिए एक समिति का गठन किया था इस समिति ने
सर्वसम्मति से #चरखा अंकित भगवा वस्त्र को भारत का
राष्ट्र ध्वज के डिजाइन को मान्यता दी किन्तु गांधी जी
की जिद के कारण उसे बदल कर तिरंगा कर दिया गया
जब #सरदार_वल्लभ_भाई_पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ
मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया तब गांधी जी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य
भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव
को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला
भारत को स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को एक समझौते के तहत 75 करोड़ रूपये देने थे भारत ने 20 करोड़ रूपये
दे भी दिए थे लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण से क्षुब्ध होकर 55 करोड़ की राशि न देने का निर्णय लिया |
जिसका #महात्मा_गांधी ने
विरोध किया और शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 55 करोड़ की राशि भारत ने पाकिस्तान
को दे दी महात्मा गांधी भारत के नहीं अपितु पाकिस्तान
के राष्ट्रपिता थे जो हर कदम पर पाकिस्तान के पक्ष में
खड़े रहे फिर चाहे पाकिस्तान की मांग जायज हो या
नाजायज गांधी ने कदाचित इसकी परवाह नहीं की
उपरोक्त घटनाओं को #देशविरोधी मानते हुए #नाथूराम
गोड़से जी ने महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित
ठहराने का प्रयास किया,

#नाथूराम ने न्यायालय में स्वीकार किया कि माहात्मा गांधी बहुत बड़े देशभक्त थे उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश सेवा की
मैं उनका बहुत आदर करता हूँ लेकिन किसी भी देशभक्त
को देश के टुकड़े करने के एक समप्रदाय के साथ पक्षपात करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ गांधी की हत्या के
सिवा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था!!
#नाथूराम_गोड़सेजी द्वारा अदालत में
दिए बयान के मुख्य अंश,
मैने गांधी को नहीं मारा
मैने गांधी का वध किया है,
वो मेरे दुश्मन नहीं थे परन्तु उनके निर्णय राष्ट्र के
लिए घातक साबित हो रहे थे,
जब व्यक्ति के पास कोई रास्ता न बचे तब वह मज़बूरी
में सही कार्य के लिए गलत रास्ता अपनाता है,
मुस्लिम लीग और पाकिस्तान निर्माण की गलत निति
के प्रति #गांधी की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने ही मुझे
मजबूर किया,
पाकिस्तान को 55 करोड़ का भुगतान करने की
गैरवाजिब मांग को लेकर गांधी अनशन पर बैठे..
बटवारे में पाकिस्तान से आ रहे हिन्दुओ की आप बीती
और दुर्दशा ने मुझे हिला के रख दिया था,
अखंड हिन्दू राष्ट्र गांधी के कारण मुस्लिम लीग
के आगे घुटने टेक रहा था,
बेटो के सामने माँ का खंडित होकर टुकड़ो में बटना
विभाजित होना असहनीय था,
अपनी ही धरती पर हम परदेशी बन गए थे,
मुस्लिम लीग की सारी गलत मांगो को
गांधी मानते जा रहे थे,
मैने ये निर्णय किया कि भारत माँ को अब और
विखंडित और दयनीय स्थिति में नहीं होने देना है
तो मुझे गांधी को मारना ही होगा
और मैने इसलिए गांधी को मारा!!
मुझे पता है इसके लिए मुझे फाँसी ही होगी
और मैं इसके लिए भी तैयार हूं,
और हां यदि मातृभूमि की रक्षा करना अपराध हे
तो मै यह अपराध बार बार करूँगा हर बार करूँगा,
और जब तक सिन्ध नदी पुनः अखंड हिन्द में न बहने
लगे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन नहीं करना!!
मुझे फाँसी देते वक्त मेरे एक हाथ में केसरिया ध्वज
और दूसरे हाथ में #अखंड_भारत का नक्शा हो,
मै फाँसी चढ़ते वक्त अखंड भारत की जय
जयकार बोलना चाहूँगा!!
हे भारत माँ मुझे दुःख है मै तेरी इतनी
ही सेवा कर पाया!!
#नाथूराम_गोडसे

🕉️🙏 वंदे मातरम 🚩🇮🇳
🇮🇳 जय हिंद - जय भारत 🙏

ये साल 1954-55 के दौरान का किस्सा है। जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो का स्टेशन तब शुरू ही हुआ था। उन दिनों असरानी साहब स्कूल...
21/10/2025

ये साल 1954-55 के दौरान का किस्सा है। जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो का स्टेशन तब शुरू ही हुआ था। उन दिनों असरानी साहब स्कूल में थे। बच्चों के एक प्रोग्राम की शुरुआत होनी थी जिसके लिए दिल्ली से ऑल इंडिया रेडियो की एक टीम जयपुर आई थी। असरानी को भी वहां जाने का मौका मिला। असरानी साहब भी बच्चों के उस प्रोग्राम के लिए ऑडिशन देने पहुंचे थे। लेकिन दिल्ली की टीम ने असरानी साहब को देखते ही रिजेक्ट कर दिया। और जानते हैं क्यों रिजेक्ट किया था? क्योंकि उस वक्त असरानी जी के नाखून काफी बढ़े हुए थे।

असरानी साहब को हैरत हुई। उन्हें समझ में नहीं आया कि बिना उनसे कुछ बुलवाए, बिना कुछ पढ़वाए ही उन्हें रिजेक्ट कर दिया। और वजह बता रहे हैं कि नाखून बढ़ रहे हैं। असरानी साहब से अगले दिन नाखून काटकर आने को कहा गया। घर पहुंचकर ये यही सोचते रहे कि नाखून बढ़ने की वजह से उन्हें क्यों रिजेक्ट किया गया? खैर, अगले दिन नाखून काटकर, जूतों को पॉलिश करके और स्कूल ड्रैस को बढ़िया से इस्त्री कराकर असरानी साहब फिर से ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पहुंचे। उन्हें देखते ही ऑडिशन लेने वाली टीम खुश हो गई।

और तब उन्हें बताया कि 'स्टूडियो में जो बच्चे जाएंगे उन्हें खुद को प्रोपर तरीके से साफ रखना होता है।' फिर वक्त आया असरानी साहब के ऑडिशन का। असरानी से पूछा गया कि तुम क्या-क्या करते हो? गाना गाते हो या डांस करते हो। या एक्टिंग करते हो। असरानी ने जवाब दिया कि मैं तो सब करता हूं। तब इनसे गाना सुनाने को कहा। उस ज़माने में नागिन (1954) फिल्म के गीत बड़े लोकप्रिय हो रहे थे। खासतौर पर वो गीत जिसके बोल थे 'मन डोले मेरा तन डोले।' असरानी साहब ने जब वो गाना गाया तो इनसे कहा गया कि गाना तो तुम रहने दो। गाने में तो तुम्हारी आवाज़ नहीं जमेगी।

तब असरानी साहब ने उन्हें एक पैसेज पढ़कर सुनाया। और इनके पढ़ने का अंदाज़ उन्हें यूनीक लगा। इन्हें सिलेक्ट कर लिया गया। बच्चों का एक नाटक शुरू हुआ जिसमें असरानी साहब को एक बड़ा ही अनोखा किरदार दिया गया। उस किरदार का नाम था चोंच। एक ऐसा बच्चा जो हर मामले में अपनी चोंच घुसाता था। असरानी साहब आवाज़ पतली करके अपने डायलॉग्स बोला करते थे। वो किरदार बहुत लोकप्रिय हुआ। इतना लोकप्रिय की आकाशवाणी जयपुर ने उस नाटक को लाइव आयोजित भी किया। और चोंच का किरदार उसमें विशेष तौर पर रखा गया। यानि वास्तव में वहां से असरानी साहब का अभिनय सफर शुरु हुआ था।

असरानी साहब को उस वक्त आकाशवाणी जयपुर की तरफ से कुछ पैसे भी मिला करते थे। शुरुआती अमाउंट था पांच रुपए। जो ठीक-ठाक था उस वक्त। असरानी साहब बताते हैं कि उस दौर में इनकी स्कूल फीस एक रुपए महीना थी। ऐसे में ये चार रुपए बचा लिया करते थे। बकौल असरानी, रेडियो स्टेशन ने उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया। वक्त गुज़रा और असरानी बच्चों के नाटकों के बाद बड़े नाटकों में भी अपनी आवाज़ देने लगे। समय के साथ असरानी साहब का मेहनताना भी बढ़ा। और अपने मेहनताने से उन्होंने जो सेविंग्स की थी उससे ही उन्होंने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिला लिया था।

असरानी साहब आज चले गए साथियों। 20 अक्टूबर 2025 को दिवाली के दिन असरानी जी का देहांत हो गया। ईश्वर असरानी जी को अपने सदचरणों में स्थान दें। असरानी जी को किस्सा टीवी का नमन। शत शत नमन।

यह है उस सीवान के खौफ़ की कहानी,जिसने पूरे बिहार को हिला दिया था — शाहाबुद्दीन का आतंक। 🔥 “ACID -कांड” — शाहाबुद्दीन का ...
20/10/2025

यह है उस सीवान के खौफ़ की कहानी,
जिसने पूरे बिहार को हिला दिया था — शाहाबुद्दीन का आतंक।


🔥 “ACID -कांड” — शाहाबुद्दीन का दरबार और सीवान की दहशत

16 अगस्त 2004 की रात थी।
सीवान की गौशाला रोड पर स्थित राजीव किराना स्टोर में 7–8 बदमाश घुस आए।
शाहाबुद्दीन के नाम से २ लाख की रंगदारी मांगी गयी
लालू - रावडी के राज में रंगदारी माँगा जाना आम बात थी
उन्होंने कैश काउंटर लूट लिया।

जब दुकान मालिक राजीव ने विरोध किया,
तो उन गुंडों ने उसे बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।
यह देखकर उसका भाई गिरीश बाथरूम में भागा,
एक बोतल तेज़ाब (एसिड) उठाई और चिल्लाया —

“भाग जाओ, वरना एसिड फेंक दूँगा!”
ये सुनकर गुंडे भाग निकले।

लेकिन थोड़ी ही देर में वे वापस लौटे —
इस बार पूरी तैयारी के साथ।
उन्होंने राजीव और उसके दोनों भाइयों, गिरीश और सतीश, को अगवा कर लिया।
तीनों को प्रतापपुर के पास गन्ने के खेतों में ले जाया गया।

वहाँ गिरीश और सतीश को पेड़ से बाँध दिया गया,
राजीव को अलग बैठा दिया गया।
थोड़ी देर बाद वहाँ पहुँचे शाहाबुद्दीन,
जो उस समय राजद (RJD) के सांसद थे।

वहाँ उसने अपना “दरबार” लगाया —
और हुक्म दिया,

“दोनों को एसिड से नहला दो।”

बस इतना कहना था —
उसके गुर्गों ने बोतलें उठाईं और दोनों भाइयों पर तेज़ाब उड़ेल दिया।
दर्द से चीखते-चिल्लाते गिरीश और सतीश वहीं जलते रहे।
धुआँ उठ रहा था, मांस पिघल रहा था, और हवा में सड़न की गंध फैल गई।
राजीव यह सब देखता रह गया — जड़ होकर, पत्थर बनकर।
उसे बंधक बना लिया गया, और उसके पिता चंदा बाबू से फिरौती माँगी गई।

तीसरे दिन किसी तरह राजीव भाग निकला और घर पहुँचा।
उसने पूरी घटना पिता को बताई।
चंदा बाबू हिल गए, लेकिन डर के बावजूद उन्होंने हिम्मत दिखाई —
और सीधे थाने पहुँच गए।

थानेदार शाहाबुद्दीन का नाम सुनते ही काँप गया।
उसने कहा,

“आप नहीं जानते, किससे टकरा रहे हैं।”
लेकिन चंदा बाबू रुके नहीं।
वे एसपी के पास गए, फिर डीआईजी के पास —
और अंततः डीआईजी के हस्तक्षेप के बाद एफआईआर दर्ज हुई।

मामला कोर्ट पहुँचा।
70 साल के चंदा बाबू ने खुद गवाही दी,
शाहाबुद्दीन को आरोपी बताया।
उन्हें डर था कि जैसे बाकी मामलों में शाहाबुद्दीन छूट जाता है,
वैसे यहाँ भी कुछ न हो जाए।

राजीव, जो इस कांड का इकलौता चश्मदीद था,
उसे 19 जून 2014 को गवाही देनी थी।
लेकिन 16 जून को,
गवाही से तीन दिन पहले,
राजीव को गोलियों से छलनी कर मार दिया गया।

⚖️ शाहाबुद्दीन — जेल में भी राजा

शाहाबुद्दीन की गिरफ्तारी तो राजद सरकार गिरने और राष्ट्रपति शासन लगने के बाद हुई।
पर असल में वह जेल में नहीं, अपने साम्राज्य में था।
सीवान जेल ही उसका दरबार थी।
हर दिन शाम 4 बजे से लोग “साहब” से मिलने आते —
समस्याएँ बताते, फैसले सुनते।
जेलर और पुलिस उसके आगे बेबस थे।
2017 में उसे आखिरकार तिहाड़ जेल भेजा गया।

☠️ अंत और विरासत

यह तो बस एक केस था।
शाहाबुद्दीन के खिलाफ़ ऐसे कई नरसंहार, अपहरण, हत्या और आतंक के मामले थे।
लेकिन किसी भी अपराध का असली दंड उसे नहीं मिला।
कोविड के दौरान उसकी प्राकृतिक मृत्यु हो गई —
बिना अपने गुनाहों का हिसाब दिए।

आज, वही शाहाबुद्दीन का बेटा उसामा
उसी पार्टी (राजद) से सीवान की रघुनाथपुर सीट से चुनाव लड़ रहा है।
लोग कहते हैं —

“अपराधी मर गए, लेकिन अपराध की विरासत अब भी ज़िंदा है।” 💔

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