09/06/2026
नीति उस काम को बिगाड़ रही है जो विज्ञान ने बनाया था। यह 'कपास उत्पादकता मिशन' के लिए एक चुनौती है।"
लेखक: अशोक गुलाटी, आयुषी गुप्ता और रीतिका जुनेजा (ICRIER)
यह लेख विश्लेषण करता है कि कैसे भारत सरकार की दोषपूर्ण नीतियां, विज्ञान द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों को बर्बाद कर रही हैं, और क्यों हाल ही में शुरू किया गया 'कॉटन उत्पादकता मिशन' (बजट: ₹5,659 करोड़) अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में संघर्ष कर सकता है।
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1. नीतिगत विफलता की भारी कीमत (आंकड़ों की जुबानी)
* अनुमान बनाम वास्तविकता: यदि भारत 2002 से 2014 के बीच की अपनी विकास रफ्तार को बनाए रखता, तो 2026 में देश का कपास उत्पादन 65.3 मिलियन गांठ (bales) तक पहुंच जाता।
* असर: लेकिन गलत नीतियों के कारण साल 2025-26 में वास्तविक उत्पादन गिरकर सिर्फ 29 मिलियन गांठ रह गया है। यह 36.3 मिलियन गांठ का भारी नुकसान पिछले एक दशक की नीतिगत विफलता का नतीजा है।
* निर्यातक से आयातक: भारत जो कभी कपास का शुद्ध निर्यातक (Net Exporter) हुआ करता था, उसे 2025-26 में 4 मिलियन गांठ कपास का आयात करना पड़ा है।
2. कैसे नीतियों ने विज्ञान का रास्ता रोका?
* अटल बिहारी वाजपेयी का दृष्टिकोण: 2002 में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जब बीटी कॉटन को मंजूरी दी थी, तब उन्होंने इसे एक "बायोटेक क्रांति" कहा था जो आम लोगों की जिंदगी बदलेगी। भारत ने इसका फायदा उठाया और दुनिया का शीर्ष कपास उत्पादक बना।
* उन्नत तकनीकों पर रोक: बीटी कॉटन की सफलता के बाद, महिको-मोनसेंटो (MMB) ने अगली पीढ़ी की तकनीक विकसित की थी—**'Bollgard II with Roundup Ready Flex'** और **'Bollgard III'**। इनमें कीड़ों से लड़ने के साथ-साथ खरपतवार (w**d) प्रबंधन की भी क्षमता थी। लेकिन भारत में इन्हें व्यावसायिक मंजूरी नहीं मिल सकी।
* मूल्य नियंत्रण की मार: 2006 से शुरू होकर 2015 के 'कॉटन सीड प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' तक, सरकार ने बीजों की कीमतें और कंपनियों की 'ट्रेट फीस' (रॉयल्टी) को इतना कम कर दिया कि अंततः 2020 तक इसे पूरी तरह खत्म कर दिया गया। इसके चलते वैश्विक कंपनियों ने भारत से अपने कदम पीछे खींच लिए।
3. वैश्विक परिदृश्य: भारत कहाँ पिछड़ गया?
* जहां भारत के किसान आज भी पुरानी और अप्रभावी तकनीक पर निर्भर हैं, वहीं ब्राजील और अमेरिका जैसे देश 'Bollgard 3 ThryvOn with XtendFlex' जैसी आधुनिक थ्री-जीन तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
* ब्राजील में 92% कपास वर्षा आधारित (rainfed) होने के बावजूद, वहां आधुनिक बीज तकनीक के दम पर किसान एक ही कृषि वर्ष में उसी जमीन पर दूसरी फसल भी ले लेते हैं।
* उत्पादकता का अंतर: भारत का कपास क्षेत्र दुनिया में सबसे बड़ा (11 मिलियन हेक्टेयर) है, लेकिन उत्पादकता सिर्फ $441 \text{ kg/ha}$ है, जो ऑस्ट्रेलिया ($2,340 \text{ kg/ha}$) और चीन ($2,311 \text{ kg/ha}$) के मुकाबले बेहद कम है।
निष्कर्ष और सरकार के पास विकल्प
लेखकों के अनुसार, सरकार का नया मिशन (जिसका लक्ष्य 2031 तक उत्पादकता को $755 \text{ kg/ha}$ तक ले जाना है) तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि बीज कंपनियों को निवेश पर सही रिटर्न की गारंटी न मिले। सरकार के सामने अब दो स्पष्ट रास्ते हैं:
1. निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन: बौद्धिक संपदा (Intellectual Property Rights) का सम्मान किया जाए और बीज नियंत्रण आदेश की समीक्षा हो, ताकि निजी आविष्कारक अपनी लागत वसूल सकें और नई तकनीक ला सकें।
2. सरकारी अनुसंधान में भारी निवेश: यदि निजी क्षेत्र को नहीं लाना है, तो सरकारी अनुसंधान (Public R&D) में बड़े पैमाने पर फंडिंग की जाए, जो कि वर्तमान में बहुत कम है।
> मुख्य निष्कर्ष: वर्तमान व्यवस्था टिकाऊ नहीं है। मूल्य नियंत्रण निजी नवाचार को दबा रहा है, और सरकारी रिसर्च को पूरा फंड नहीं मिल रहा है। क्या नया कॉटन मिशन इस नीतिगत नुकसान की भरपाई कर पाएगा? यह केवल आने वाला समय ही बताएगा।