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https://youtu.be/7Sp9SeD_YCo?si=5uAZ9i8tuG1agdY3इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय पर आधार...
28/09/2026

https://youtu.be/7Sp9SeD_YCo?si=5uAZ9i8tuG1agdY3

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय पर आधारित पुस्तक के विमोचन का यह पूरा कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण और गरिमापूर्ण रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात विचारक एवं चिंतक श्री बनवारी जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में माननीय केंद्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी उपस्थित रहे। इसके साथ ही अनेक गणमान्य अतिथियों, विद्वानों तथा साहित्य और कला जगत से जुड़े लोगों की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

इस अवसर पर श्री राम बहादुर राय के व्यक्तित्व, उनके विचारों और सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई। पुस्तक उनके जीवन, विचार और कार्यों के विभिन्न पहलुओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है और भारतीय पत्रकारिता, संस्कृति तथा सार्वजनिक विमर्श के क्षेत्र में उनके योगदान को सामने लाती है।

इस पूरे कार्यक्रम का वीडियो प्रस्तुत है, जिसमें पुस्तक के विमोचन से लेकर अतिथियों के विचारों और कार्यक्रम के विभिन्न महत्वपूर्ण प्रसंगों को देखा और सुना जा सकता है।

प्रभात प्रकाशन और प्रज्ञा संस्थान द्वारा आयोजित इस भव्य समारोह में ...

खुद से यारी का चस्का क्या लगा मैं अपनों से दूर होता गया।मेरी किताब से  #मेरी किताब से # # hindi     philosophy
09/09/2026

खुद से यारी का चस्का क्या लगा
मैं अपनों से दूर होता गया।

मेरी किताब से
#मेरी किताब से # # hindi philosophy

सुभाष चंद्रा–NCLT मामला: गलती किसकी और भविष्य के लिए क्या सबक?सुभाष चंद्रा से जुड़े NCLT के हालिया फैसले ने भारतीय बैंकि...
29/08/2026

सुभाष चंद्रा–NCLT मामला: गलती किसकी और भविष्य के लिए क्या सबक?

सुभाष चंद्रा से जुड़े NCLT के हालिया फैसले ने भारतीय बैंकिंग और insolvency व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। लगभग ₹22,006.57 करोड़ के admitted creditor claims के मुकाबले व्यक्तिगत स्तर पर लगभग ₹6.25–6.5 करोड़ का repayment plan स्वीकार किया गया है। इसी कारण लगभग 99.97% का “haircut” चर्चा में है। हालांकि इस आंकड़े को समझना बहुत जरूरी है: यह ऐसा मामला नहीं है कि सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत रूप से ₹22,000 करोड़ का कर्ज लिया था और अब केवल ₹6.5 करोड़ चुका रहे हैं। वे मुख्य रूप से विभिन्न कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के personal guarantor थे। (The Economic Times)

1. सुभाष चंद्रा कितने दोषी हैं?

उन्हें पूरी तरह निर्दोष कहना उचित नहीं होगा, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उन्हें सीधे “₹22,000 करोड़ का कर्ज लेकर डुबाने वाला व्यक्ति” कहना भी सही नहीं है।

Personal guarantee देना अपने आप में गंभीर वित्तीय जिम्मेदारी है। किसी promoter द्वारा कंपनियों के बड़े कर्ज की व्यक्तिगत गारंटी लेने का अर्थ है कि उसे उस कर्ज के जोखिम की जिम्मेदारी का अंदाजा था।

दूसरी ओर, यह भी देखना होगा कि जिन कंपनियों ने मूल रूप से पैसा उधार लिया, उन्होंने उस धन का उपयोग किस प्रकार किया, कारोबार में नुकसान क्यों हुआ, कौन-सी परियोजनाएं असफल हुईं और क्या किसी प्रकार की अनियमितता या धन के दुरुपयोग का प्रमाण है।

इसलिए सुभाष चंद्रा की जिम्मेदारी को तीन हिस्सों में देखना चाहिए:

व्यावसायिक निर्णयों की जिम्मेदारी — हाँ।
अपने द्वारा दी गई personal guarantees की जिम्मेदारी — हाँ।
पूरे ₹22,006 करोड़ को व्यक्तिगत रूप से लेकर खर्च करने या हड़पने की जिम्मेदारी — उपलब्ध जानकारी से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

2. बैंकों और financial institutions की जिम्मेदारी भी कम महत्वपूर्ण नहीं

यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रश्न है।

यदि किसी कारोबारी समूह को हजारों करोड़ रुपये का ऋण दिया गया, तो lenders को उसकी repayment capacity, collateral, cash flow, promoter guarantees और group-level exposure का गहन आकलन करना चाहिए था।

आज यदि उसी exposure से creditors को लगभग नगण्य recovery मिल रही है, तो केवल borrower को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है।

बैंकों को यह भी बताना चाहिए:

* इतनी बड़ी credit exposure की मंजूरी किस आधार पर हुई?
* उस समय promoter की वास्तविक net worth कितनी आंकी गई?
* personal guarantee का मूल्यांकन कैसे किया गया?
* collateral और pledged shares की वास्तविक सुरक्षा कितनी थी?
* कर्ज के बाद funds का उपयोग और diversion किस प्रकार monitor किया गया?
* जब financial stress दिखाई देने लगा, तब lenders ने समय रहते क्या कदम उठाए?

हालिया रिपोर्टों में bankers ने Resolution Professional की भूमिका और Subhash Chandra की net worth निर्धारित करने की methodology पर भी प्रश्न उठाए हैं। (The Economic Times)

3. क्या NCLT का फैसला गलत है?

इसे अभी अंतिम रूप से “गलत” कहना उचित नहीं होगा। NCLT ने उपलब्ध insolvency framework और सामने रखी गई financial position के आधार पर repayment plan को मंजूरी दी है।

Tribunal के सामने यह महत्वपूर्ण तथ्य था कि personal guarantor के पास वास्तव में कितनी recoverable assets हैं। यदि उसकी वास्तविक व्यक्तिगत संपत्ति सीमित है, तो केवल ₹22,000 करोड़ की claim देखकर उतनी ही राशि वसूलना व्यावहारिक नहीं हो सकता।

लेकिन 99.97% haircut का मामला असाधारण है। यही कारण है कि कई lenders ने इसका विरोध किया है और Union Bank, LIC Housing Finance तथा अन्य creditors द्वारा इसे चुनौती दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। (The Economic Times)

इसलिए अंतिम न्यायिक स्थिति आगे की अपील और समीक्षा से और स्पष्ट होगी।

4. सरकार की संभावित गलती कहाँ है?

यहाँ “सरकार ने ₹22,000 करोड़ माफ कर दिए” कहना भी सही नहीं होगा।

लेकिन सरकार और regulators के सामने निश्चित रूप से कुछ नीतिगत प्रश्न हैं।

पहला — personal guarantor की insolvency व्यवस्था।
बड़े corporate promoters द्वारा दी गई personal guarantees के मामले में उनकी वास्तविक संपत्ति, beneficial ownership और related-party transactions की जांच अत्यंत मजबूत होनी चाहिए।

दूसरा — bank accountability।
यदि हजारों करोड़ रुपये का ऋण दिया गया और अंततः recovery नगण्य रही, तो केवल NPA घोषित करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। बड़े ऋणों की मंजूरी और monitoring में यदि गंभीर लापरवाही हुई हो तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

तीसरा — valuation की पारदर्शिता।
Promoter की net worth और assets की valuation स्वतंत्र, पारदर्शी और audit-able होनी चाहिए, ताकि यह विवाद न रहे कि insolvency के समय वास्तविक संपत्ति कितनी थी।

चौथा — related-party और asset transfers की जांच।
Insolvency से पहले संपत्ति का ownership transfer, family/related entities को transfer या किसी अन्य तरीके से assets को creditors से दूर करने की कोशिश हुई या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक होनी चाहिए।

5. आम आदमी को इससे क्या सीखना चाहिए?

इस मामले की सबसे बड़ी सीख आम आदमी के लिए है:

“जिस कर्ज की repayment क्षमता आपके पास नहीं है, उसकी guarantee कभी भी भावनाओं या रिश्तों के आधार पर न लें।”

अगर कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य, मित्र या business partner के लिए loan guarantee देता है और borrower default कर देता है, तो guarantor की अपनी संपत्ति और वित्तीय भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

दूसरी सीख है कि बड़ी संपत्ति देखकर बड़ी borrowing capacity का अनुमान नहीं लगाना चाहिए।

तीसरी सीख निवेशकों के लिए है—किसी कंपनी की चमकदार brand image देखकर केवल promoter की प्रतिष्ठा पर भरोसा नहीं करना चाहिए। Debt-equity ratio, cash flow, pledged shares, related-party transactions और contingent liabilities को भी देखना चाहिए।

6. भविष्य में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

इस मामले से भारत की banking और insolvency व्यवस्था के लिए पाँच स्पष्ट सुधार निकलते हैं:

1. ₹500 करोड़ या उससे अधिक के बड़े loans की independent credit review व्यवस्था मजबूत हो।
2. Promoter की personal guarantee की वास्तविक net worth हर वर्ष पुनः assess की जाए।
3. Loan disbursement के बाद funds का end-use monitoring अनिवार्य और कठोर हो।
4. Insolvency के समय assets और related-party transactions की forensic जांच हो।
5. यदि बैंक की lending में गंभीर negligence पाई जाए तो केवल taxpayer या depositors को नुकसान सहने के बजाय जिम्मेदार अधिकारियों की accountability तय हो।

निष्कर्ष

सुभाष चंद्रा प्रकरण को न तो केवल “बड़े कारोबारी को सरकार ने बचा लिया” के रूप में देखना चाहिए और न ही “सुभाष चंद्रा ने ₹22,000 करोड़ का कर्ज लेकर केवल ₹6.5 करोड़ चुका दिए” जैसी सरल धारणा बनानी चाहिए।

असल तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है।

चंद्रा की जिम्मेदारी है क्योंकि उन्होंने बड़े corporate borrowings की personal guarantees दीं और उन व्यावसायिक फैसलों से जुड़े थे जिनसे यह financial संकट पैदा हुआ। लेकिन lenders की भी जिम्मेदारी है कि उन्होंने इतना बड़ा exposure क्यों और किस risk assessment के आधार पर दिया।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है:

यदि ₹22,000 करोड़ से अधिक का exposure अंततः creditors के लिए लगभग नगण्य recovery में बदल सकता है, तो गलती केवल borrower की नहीं हो सकती। यह borrower, lenders, risk assessment, monitoring और insolvency framework—पूरी व्यवस्था की संयुक्त परीक्षा है।

और आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सबक यही है—कर्ज लेना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है यह समझना कि उसकी guarantee देने पर असफलता की कीमत कौन चुकाएगा।

25/08/2026

नवभारत टाइम्स के मंगलवार 25 अगस्त 2026 के संपादक पर एक नजरिया।

“आईआईटी की डिग्री पर क्या घट रहा भरोसा” शीर्षक से प्रकाशित यह लेख आज की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था में हो रहे एक बड़े बदलाव को सामने रखता है। कभी IIT जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं की डिग्री को सफल करियर की लगभग निश्चित गारंटी माना जाता था, लेकिन बदलते तकनीकी और औद्योगिक वातावरण ने इस धारणा को चुनौती दी है। आज कंपनियां केवल डिग्री या संस्थान का नाम नहीं देख रहीं, बल्कि यह देख रही हैं कि युवा वास्तव में क्या कर सकता है, उसकी समस्या-समाधान क्षमता कितनी है और वह तेजी से बदलती तकनीक के साथ स्वयं को कितना ढाल सकता है।

इस बदलाव को केवल IIT की डिग्री के घटते महत्व के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह पूरी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है—क्या हमारी शिक्षा युवाओं को रोजगार के लिए तैयार कर रही है या केवल डिग्रियां प्रदान कर रही है? आज भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन शिक्षा से रोजगार तक का संक्रमण अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। हालिया अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि स्नातकों की संख्या में वृद्धि रोजगार के समान अनुपात में नहीं हुई है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि AI और ChatGPT जैसी तकनीकों ने युवाओं को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर भी वे असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें यह स्पष्ट नहीं है कि आने वाले समय में उनकी वर्तमान योग्यता का कितना मूल्य रह जाएगा और उन्हें अपने आपको किस दिशा में तैयार करना चाहिए। AI कुछ पारंपरिक नौकरियों की प्रकृति बदल रहा है और नई नौकरियां भी पैदा कर रहा है, लेकिन इसका दबाव विशेष रूप से fresh graduates पर दिखाई दे रहा है।

अगला एक दशक इस दृष्टि से निर्णायक होगा। आज यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि AI, ऑटोमेशन और बदलती अर्थव्यवस्था रोजगार का कौन-सा नया स्वरूप बनाएंगे। लेकिन तब तक बड़ी संख्या में ऐसे युवाओं का जीवन एक ऐसे मोड़ पर पहुंच सकता है, जहां अंधकार अधिक और रोशनी कम दिखाई दे, यदि शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच का अंतर समय रहते समाप्त नहीं किया गया।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। AI-संबंधी रोजगार और कौशल की मांग तेजी से बढ़ रही है और भारत में AI तथा अन्य नई तकनीकों से जुड़े अवसर भी विकसित हो रहे हैं। इसलिए आवश्यकता IIT या किसी अन्य डिग्री के महत्व को कम करने की नहीं, बल्कि डिग्री को कौशल, अनुभव, इंटर्नशिप, उद्यमिता और निरंतर सीखने की क्षमता से जोड़ने की है।

सरकार, विश्वविद्यालयों और उद्योगों को मिलकर ऐसा शिक्षा मॉडल बनाना होगा जिसमें विद्यार्थी केवल परीक्षा पास करने और डिग्री प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने के लिए तैयार हों। कॉलेजों में उद्योग आधारित प्रशिक्षण, अनिवार्य इंटर्नशिप, AI और डिजिटल कौशल, communication skills तथा entrepreneurship को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। IIT Madras द्वारा employability assessment और placement-oriented training जैसी पहलें इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत हैं।

अंततः इस लेख की सबसे महत्वपूर्ण सीख यही है कि भविष्य में डिग्री की कीमत समाप्त नहीं होगी, लेकिन अकेली डिग्री पर्याप्त नहीं होगी। आने वाला समय उस युवा का होगा जो अपनी डिग्री के साथ लगातार सीखने, तकनीक को समझने और बदलती परिस्थितियों में स्वयं को पुनः तैयार करने की क्षमता रखता हो। यदि शिक्षा व्यवस्था इस परिवर्तन को समय रहते स्वीकार कर लेती है तो आज का यह चौराहा युवाओं को अंधकार की ओर नहीं, बल्कि नए अवसरों और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकता है।

19/08/2026

नवभारत टाइम्स बुधवार 19 अगस्त 2026 के संपादकीय लेख बाजार गिर रहा है पर उम्मीद कायम पर सोमनाथ मुखर्जी ने अपनी निजी राय रखी है। लेख पर एक नजर।

यह लेख भारतीय शेयर बाजार में हाल की गिरावट के पीछे FPI की निकासी, पश्चिम एशिया के तनाव, बढ़ते कच्चे तेल के दाम और वैश्विक अनिश्चितता को प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित करता है। लेख की सबसे अच्छी बात यह है कि यह केवल निराशा का चित्र प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत घरेलू मांग, कंपनियों के बेहतर तिमाही परिणाम, ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं और विदेशी निवेशकों की वापसी को उम्मीद के संकेत के रूप में देखता है। हालांकि, इसे थोड़ा अधिक संतुलित बनाने के लिए महंगाई, रुपये पर दबाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और घरेलू बाजार के अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्यांकन जैसे जोखिमों पर भी अधिक चर्चा होनी चाहिए। खास बात यह है कि जुलाई में FPI फिर से भारतीय इक्विटी में शुद्ध खरीदार बने और अगस्त के पहले पखवाड़े में भी खरीदारी के संकेत मिले हैं, इसलिए केवल “FPI के जाने” को वर्तमान स्थिति का आधार मानना पूरी तरह सही नहीं होगा। वहीं, 19 अगस्त 2026 तक पश्चिम एशिया की अनिश्चितता और करीब $92 के कच्चे तेल ने बाजार पर दबाव बनाए रखा है। भविष्य के समाधान के लिए भारत को विदेशी पूंजी पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय घरेलू निवेश को मजबूत करना, रुपये और तेल की कीमतों के जोखिम को नियंत्रित करना, ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाना, विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा देना तथा निवेशकों के लिए कर और नियामकीय व्यवस्था को अधिक स्थिर एवं पारदर्शी बनाना चाहिए। साथ ही सरकार और RBI को वैश्विक संकट के समय बाजार में भरोसा बनाए रखने के लिए स्पष्ट नीतिगत संकेत देने होंगे। इसलिए लेख का संदेश सही दिशा में है—**बाजार की अस्थायी गिरावट को लेकर घबराने के बजाय भारत की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन उम्मीद के साथ जोखिमों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।**

17/08/2026

नवभारत टाइम्स का दूसरा संपादकीय के लेख पर राय

मृत्युंजय राय का लेख “कौन है ऑनलाइन होने की लत लगने वाले” तथ्यात्मक जानकारी और समस्या की व्यापकता को सामने रखने में उपयोगी है, लेकिन यदि इसमें कुछ वास्तविक जीवन की घटनाओं या बच्चों और अभिभावकों से जुड़े मार्मिक उदाहरण शामिल होते तो इसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा होता। आज ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन पर रहने की आदत बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, नींद की समस्या, पढ़ाई से दूरी, सामाजिक अलगाव और माता-पिता से संवादहीनता जैसी समस्याएँ पैदा कर रही है। मसलन, कई बच्चे फोन हटाए जाने पर असामान्य क्रोध या तनाव दिखाते हैं और कुछ बच्चे वास्तविक मित्रों व परिवार से अधिक आभासी दुनिया में समय बिताने लगते हैं। इसलिए लेख को केवल तथ्य बताने के बजाय यह सवाल भी उठाना चाहिए था कि माता-पिता समय रहते इन संकेतों को कैसे पहचानें और क्या करें। आगे स्कूलों में डिजिटल-वेलनेस जागरूकता, अभिभावक कार्यशालाएँ, बच्चों के लिए स्क्रीन-टाइम की स्पष्ट सीमाएँ, परिवार में ‘नो-फोन टाइम’ और खेल-पठन जैसी वैकल्पिक गतिविधियों को बढ़ावा देना इस समस्या से निपटने के महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। �

17/08/2026

नवभारत टाइम्स 17 अगस्त 2026 के संपादकीय के प्रथम लेख "काबुल में कैसे बड़ा भारत का कद" जिसके लेखक संजय कुमार भारद्वाज है। उनके लेख पर एक राय।

लेख अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी को केवल अचानक हुई सत्ता-परिवर्तन की घटना न मानकर उसके पीछे वर्षों से चल रहे संघर्ष, क्षेत्रीय राजनीति और बदलते शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर उचित ध्यान देता है। आज काबुल में भारत की भूमिका को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के लगभग बारह वर्षों के कार्यकाल में भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संपर्क, विकास-सहयोग और कूटनीतिक सक्रियता के माध्यम से अपनी क्षेत्रीय हैसियत मजबूत की है; हालांकि तालिबान की सत्ता में वापसी में मोदी सरकार की किसी प्रत्यक्ष भूमिका का दावा तथ्यात्मक प्रमाण के बिना करना उचित नहीं होगा। भारत ने अफगानिस्तान में विकास परियोजनाओं, मानवीय सहायता, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार सहयोग दिया है और 2026 में भी दोनों देशों के बीच कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार और मानवीय सहयोग बढ़ा है। इसलिए काबुल भारत के लिए केवल सामरिक दृष्टि से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अफगानिस्तान भारत की प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगा देश नहीं है, लेकिन पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर और मध्य एशिया की भौगोलिक स्थिति के कारण उसका भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों से गहरा संबंध है। बदलते क्षेत्रीय समीकरणों में भारत को अफगान जनता के सुख-दुःख में साथ देते हुए आतंकवाद के विरुद्ध सतर्कता, मानवीय सहायता और संतुलित कूटनीति—तीनों को साथ लेकर चलना चाहिए; यही भारत के बढ़ते वैश्विक कद और जिम्मेदार पड़ोसी की वास्तविक पहचान होगी।

16/08/2026

नवभारत टाइम्स 16 अगस्त 2026 नमिता जोशी का संपादकीय पेश का पहला लेख "हर ड्राइंग रूम में छिड़ी है आजादी की जंग" पर राय ।

यह लेख आज के Gen Z की बदलती आकांक्षाओं और परिवार के भीतर चल रही ‘आजादी की लड़ाई’ को बहुत सहज लेकिन गंभीर ढंग से सामने रखता है। पहले जहां माता-पिता के लिए सफलता का अर्थ अच्छी पढ़ाई, नौकरी और आर्थिक स्थिरता था, वहीं आज की पीढ़ी अपने काम, समय, रिश्तों और जीवन-शैली पर स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहती है। मेरी दृष्टि में लेख की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संघर्ष केवल पीढ़ियों का मतभेद नहीं है, बल्कि दो अलग जीवन-दृष्टियों का टकराव है। माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर सुरक्षा चाहते हैं, जबकि Gen Z अनुभव के बजाय अपनी पसंद और प्रयोग को प्राथमिकता देती है। समस्या तब पैदा होती है जब स्वतंत्रता संवाद की जगह जिद और अधिकार की जगह केवल व्यक्तिगत सुविधा बन जाती है। इससे परिवारों में अनकहा तनाव, दूरी और भावनात्मक दरार पैदा होना स्वाभाविक है।

लेख को अगली कड़ी तक ले जाएं तो बड़ा प्रश्न यह है कि क्या Gen Z की यह अति-आधुनिकता उसे वास्तव में अधिक स्वतंत्र बनाएगी या धीरे-धीरे अपने ही लोगों से भावनात्मक रूप से दूर कर देगी? मेरी दृष्टि में आजादी का अर्थ माता-पिता से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उनके अनुभव को सम्मान देते हुए अपने फैसले लेने की क्षमता विकसित करना है। इसी तरह माता-पिता को भी अपनी पुरानी सफलताओं और आशंकाओं को बच्चों पर थोपने के बजाय बदलते समय को समझना होगा। असली समाधान ‘कौन सही है’ में नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और जिम्मेदारी के बीच संतुलन में है। आने वाले समय में वही परिवार मजबूत रहेंगे जहां बच्चों को उड़ने की आजादी मिलेगी, लेकिन घर लौटने के लिए भावनात्मक दरवाजा भी खुला रहेगा। यही इस लेख को केवल Gen Z की कहानी न बनाकर बदलते भारतीय परिवार और भविष्य के समाज पर एक गंभीर चेतावनी बना देता है।

16/08/2026

नवभारत टाइम्स 16 अगस्त 2026 संपादकीय का दूसरा लेख

लेख “स्वतंत्रता दिवस: तलवार अभी भी सिर पर है” में आचार्य प्रशांत ने स्वतंत्रता को मुख्यतः भीतरी मानसिक और आध्यात्मिक गुलामी से जोड़कर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, लेकिन उनके तर्क में कई जगह अतिसरलीकरण दिखाई देता है। यह कहना कि गुलामी का मूल कारण हमारी अपनी मानसिकता, स्वार्थ और अहंकार था, इतिहास की जटिल वास्तविकताओं को एक ही कारण में समेट देना है। भारत की राजनीतिक गुलामी केवल भारतीयों की आंतरिक कमजोरियों से नहीं आई थी; उसके पीछे सैन्य शक्ति, औद्योगिक क्रांति, व्यापारिक हित, औपनिवेशिक संस्थाएँ, आर्थिक शोषण और विश्व-राजनीति जैसे ठोस कारण भी थे। इसी तरह “हम जन्म से स्वतंत्र हैं” कहना दार्शनिक अर्थ में भले आकर्षक हो, पर सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता जन्मसिद्ध रूप से उपलब्ध नहीं होती—उसे संविधान, संस्थाओं, संघर्ष और नागरिक अधिकारों के माध्यम से सुरक्षित रखना पड़ता है। स्वयं गीता भी मन की स्वतंत्रता के साथ कर्तव्य और कर्म को अनिवार्य मानती है—“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर” (3.19), अर्थात अनासक्त होकर भी निरंतर कर्तव्य-कर्म करना है। इसलिए आध्यात्मिक मुक्ति को राजनीतिक स्वतंत्रता का विकल्प बनाना उचित नहीं है।

आचार्य प्रशांत का धर्म, अंधविश्वास, कुंडली और सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार अपने स्थान पर उचित है, लेकिन धर्म और अंधविश्वास को एक ही मान लेना स्वयं एक वैचारिक भूल है। भारतीय शास्त्र व्यक्ति को प्रश्न करने, विवेक विकसित करने और आत्म-संयम की शिक्षा देते हैं। गीता का “उद्धरेदात्मनात्मानं… आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः” (6.5) मनुष्य को स्वयं को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी देता है, लेकिन यही शास्त्रीय परंपरा कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म और उत्तरदायित्व की बात करती है। आधुनिक विज्ञान भी यह बताता है कि मनुष्य की आदतें और व्यवहार स्थायी रूप से जमे हुए नहीं हैं—न्यूरोप्लास्टिसिटी के शोध से प्रमाणित है कि सीखने और अनुभव से मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली बदल सकती है। अतः “भीतरी गुलामी” को पहचानना उपयोगी है, लेकिन उसे समाज और इतिहास की हर समस्या की अंतिम व्याख्या मान लेना वैज्ञानिक या ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। लेख के अंतिम हिस्से में जब वे चेताते हैं कि स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त का उत्सव नहीं बल्कि निरंतर नागरिक जिम्मेदारी, सत्य, विवेक, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व है, वहाँ उनसे पर्याप्त सहमति बनती है। मेरी आपत्ति केवल इतनी है कि आज की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आत्मशुद्धि जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक-सामरिक आत्मनिर्भरता और नागरिक कर्तव्य भी हैं। तलवार केवल सिर के ऊपर नहीं, यदि हम निष्क्रिय रहें तो वह संस्थाओं और सामाजिक चेतना के भीतर भी उतर सकती है। यही इस लेख की सबसे सार्थक चेतावनी है—लेकिन इसे आध्यात्मिक उपदेश से आगे बढ़ाकर ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विवेक से देखना होगा।

16/08/2026

Indian express newspaper August 16 20 26 फर्स्ट आर्टिकल ऑफ़ एडिटोरियल writer विवेक शुक्ला
"Memories of partition from a railway station in Delhi"

विवेक शुक्ला का लेख केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति का आईना है। रेलवे स्टेशन जैसे साधारण स्थान को केंद्र में रखकर लेखक ने दिखाया है कि विभाजन के समय वही स्टेशन किसी के लिए घर छोड़ने की मजबूरी, किसी के लिए बिछड़ने का दर्द और किसी के लिए एक अनजान भविष्य की शुरुआत बन गया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लेख हमें याद दिलाता है कि इतिहास को केवल तारीखों और राजनीतिक फैसलों से नहीं समझा जा सकता; उसके पीछे लाखों लोगों के टूटे घर, छूटे रिश्ते और दबे हुए आँसू भी होते हैं। 80 वर्ष बाद इन स्मृतियों को सामने लाना इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी समझ सके कि नफरत और बँटवारे की कीमत हमेशा आम इंसान ही चुकाता है। यही इस लेख की सबसे बड़ी सार्थकता है।

आजादी के 80 वर्ष बाद भी विभाजन का दर्द इतिहास की किसी पुरानी किताब में बंद नहीं हुआ है। जिन लोगों ने उस त्रासदी को अपनी आँखों से देखा, उनके लिए वे यादें आज भी उतनी ही कड़वी हैं; उन क्षणों को याद करते ही उनकी रूह काँप उठती होगी। विवेक शुक्ला का यह लेख दिल्ली के रेलवे स्टेशन से जुड़ी स्मृतियों के जरिए उसी मानवीय पीड़ा को सामने लाता है। लेख की खासियत यह है कि वह विभाजन को केवल आँकड़ों और राजनीति से नहीं, बल्कि बिछड़ते परिवारों, भय, पलायन और अनिश्चित भविष्य के दर्द से देखता है। यह लेख हमें याद दिलाता है कि देश का बँटवारा केवल जमीन का नहीं था, बल्कि लाखों दिलों और रिश्तों का भी बँटवारा था। ऐसी स्मृतियों को बचाए रखना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास को केवल पढ़ें नहीं, उसकी कीमत भी समझें और नफरत की जगह इंसानियत को चुनें।

विवेक शुक्ला का लेख विभाजन के दर्द को मानवीय संवेदना के साथ सामने लाता है। रेलवे स्टेशन की स्मृतियाँ विस्थापन, बिछड़ने और भय की उस त्रासदी को जीवंत करती हैं। लेख की संवेदनशीलता प्रभावी है, हालांकि राजनीतिक और सामाजिक कारणों का विश्लेषण थोड़ा और गहरा हो सकता था। फिर भी यह लेख याद दिलाता है कि विभाजन केवल जमीन का नहीं, लाखों रिश्तों और जीवन का भी बँटवारा था।

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