23/04/2026
कभी-कभी सच इतना कड़वा होता है कि उसे कहने से पहले ही गला सूख जाता है लेकिन फिर भी कहना पड़ता है, क्योंकि चुप रहना उससे भी ज़्यादा घुटन देता है।
पुरुष होना इस समाज में कोई विशेषाधिकार नहीं, एक अदृश्य जिम्मेदारी है जो जन्म के साथ ही कंधों पर रख दी जाती है। जन्म लेते ही जैसे कोई फुसफुसा कर कह देता है “तुम्हें रोना नहीं है…तुम्हें कमाना है।”
बचपन से ही उसकी हँसी पर शर्तें लग जाती हैं।
उसे खिलौनों से नहीं, भविष्य से खेलना सिखाया जाता है। जब वो गिरता है, उसे उठाने से पहले ये सिखाया जाता है कि मर्द बनो, दर्द नहीं दिखाते। धीरे-धीरे वो बच्चा नहीं रहता, एक प्रोजेक्ट बन जाता है। घर की उम्मीदों का प्रोजेक्ट। माँ-बाप के अधूरे सपनों का प्रोजेक्ट। समाज के बनाए साँचे में ढलने का प्रोजेक्ट।
और सबसे दर्दनाक बात ये है कि उसे कभी ये नहीं पूछा जाता कि तुम क्या चाहते हो? बल्कि उसे बस बताया जाता है "तुम्हें क्या करना है"।
वो पढ़ता है, इसलिए नहीं कि उसे ज्ञान से प्रेम है, बल्कि इसलिए कि उसे कमाना है। वो नौकरी करता है, इसलिए नहीं कि वो खुश है, बल्कि इसलिए कि घर चलाना है।
उसकी ज़िंदगी धीरे-धीरे उसकी अपनी नहीं रहती, वो एक “इन्वेस्टमेंट” बन जाता है, जिसमें भावनाएँ नहीं, सिर्फ़ “रिटर्न” देखे जाते हैं।
जब तक वो कमाता है, झुकता है, सहता है तब तक वो अच्छा बेटा, अच्छा पति , अच्छा पिता है, और जिस दिन वो टूट जाए, थक जाए, या रुक जाए उसी दिन वो “नालायक” हो जाता है।
कोई नहीं पूछता कि उसके अंदर कितना शोर है। कोई नहीं देखता कि उसकी मुस्कान के पीछे कितनी थकान है। कोई नहीं समझता कि वो भी रातों में चुपचाप रोता है। बस आवाज़ नहीं करता, क्योंकि उसे सिखाया गया है कि “मर्द रोते नहीं।”
उसकी भावनाएँ मज़ाक बन जाती हैं। उसका दर्द कमजोरी कहलाता है। उसका अकेलापन उसकी आदत मान लिया जाता है।
वो हर रिश्ते में देता ही देता है
बेटा बनकर देता है,
भाई बनकर देता है,
पति बनकर देता है,
पिता बनकर देता है…
लेकिन कभी कोई रिश्ता उससे ये नहीं कहता कि "तुम भी थक सकते हो…तुम भी टूट सकते हो…तुम भी इंसान हो।”
उसके कंधे मजबूत समझ लिए जाते हैं, इसलिए उन पर हर बोझ रख दिया जाता है और धीरे-धीरे वो कंधे नहीं, एक ढोने वाली मशीन बन जाते हैं। सबको उसका संघर्ष दिखता है, लेकिन किसी को उसका सन्नाटा नहीं सुनाई देता।
और सबसे कड़वा सच ये है कि जब वो अपनी ज़रूरतें, अपने सपने, अपनी खुशियाँ सब कुछ कुर्बान कर देता है तो भी उसे “फर्ज़” कहा जाता है, “प्यार” नहीं।
शायद इसलिए कई बार मन चीख उठता है, क्या सच में पुरुष होना सिर्फ़ एक ज़रिया है? एक ऐसा ज़रिया, जिससे सबको सहारा मिले, लेकिन खुद वो कभी सहारा ना पा सके?
ये सवाल गलत नहीं है, ये दर्द है जो सालों से दबा हुआ है। पुरुष पत्थर नहीं होते, बस उन्हें पत्थर बनने पर मजबूर कर दिया जाता है, और एक दिन वो सच में पत्थर हो जाते हैं बिना शिकायत, बिना आवाज़, बस खड़े रहते हैं जब तक टूट न जाएँ।
तब मन से आह निकलती है, चीख निकलती है कि इतनी वीभत्सता से अच्छा है वो जन्म ही न लें या जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएं!
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#मेरी_जीवन_की_आत्मकथा 💐🙏🙏