03/05/2025
"अब जागो – अपने समाज, अपनी कारीगरी और अपने स्वाभिमान के लिए"
आज फिर एक बंगाली कारीगर लाखों का सोना, चांदी और नकद लेकर फरार हो गया। ये पहली बार नहीं है — मगर हर बार हम चुप रह जाते हैं। सोचिए, गलती सिर्फ उसकी नहीं है… गलती हमारी भी है।
हम अपने लालच में, दो पैसे सस्ते मुनाफे के लिए बाहर से आए कारीगरों को तो काम दे देते हैं, लेकिन अपने ही समाज के पुराने, भरोसेमंद और स्थायी स्वर्णकार भाइयों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
वो भाई जो हमारे साथ पले-बढ़े हैं… जिनका अपना घर है, परिवार है… वो दो पैसे ज़्यादा मांग लें तो हमें बोझ लगते हैं। लेकिन जो अनजान है, अस्थायी है, हर बार नई जगह जाता है, कम पैसों में गुज़ारा करता है — उस पर हम आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं।
हम क्यों नहीं समझते कि अस्थायीत्व, असंतोष और परायापन — ईमानदारी को ज़्यादा दिन तक ज़िंदा नहीं रख सकते।
ये बाहर से आए कारीगर जब भी मौका पाते हैं, हमारे ही खून-पसीने की कमाई लेकर निकल जाते हैं।
अब समय आ गया है कि हम जागें, सोचें और बदलें।
आइए, संकल्प लें:
अपने ही समाज के कारीगर भाइयों को प्राथमिकता देंगे।
सस्ते लालच से ऊपर उठकर सुरक्षित, स्थायी और आत्मनिर्भर व्यवस्था बनाएंगे।
अपनी कारीगरी संस्कृति को बचाएंगे, उसे मज़बूत करेंगे।
भरोसे और भाईचारे की बुनियाद पर फिर से एक स्वर्ण समाज खड़ा करेंगे।
मुनाफा भले थोड़ा कम हो,
लेकिन भरोसा – बहुत बड़ा होगा।
समाज मज़बूत होगा,
और हम – आत्मनिर्भर बनेंगे।
अब जागो – क्योंकि अगली बार, शायद नुकसान आपका हो।