22/01/2026
गौतम बुद्ध एक दिन मौन में बैठे लोगों से बात कर रहे थे। शब्द कम थे, उपस्थिति ज़्यादा। उसी मौन को तोड़ता हुआ एक व्यक्ति आया—आक्रोश से भरा हुआ, भीतर की आग से जलता हुआ।
उसने बुद्ध को गालियाँ दीं, अपमान किया, अपनी सारी कड़वाहट उन पर फेंक दी।
बुद्ध वैसे ही बैठे रहे—न कोई प्रतिक्रिया, न कोई बचाव। जैसे सामने कोई व्यक्ति नहीं, केवल हवा गुजर रही हो। वह आदमी बोलता रहा, थक गया, और अंत में चुप हो गया।
तभी बुद्ध ने बहुत कोमल स्वर में पूछा—
“कभी सोचा है, अगर कोई तुम्हें कुछ देना चाहे और तुम लेने से इंकार कर दो, तो वह किसके पास रह जाता है?”
वह व्यक्ति ठिठका। बोला—
“देने वाले के पास।”
बुद्ध हल्के से हँसे। वह हँसी उपदेश नहीं थी, करुणा थी।
उन्होंने कहा—
“मैंने तुम्हारा क्रोध नहीं लिया, तुम्हारा ज़हर स्वीकार नहीं किया। तुम जिसे मुझ पर फेंक रहे थे, वह तुमसे अलग कभी हुआ ही नहीं।”
उस क्षण उस व्यक्ति के भीतर कुछ टूट गया। पहली बार उसने देखा—बुद्ध ने कुछ किया ही नहीं, और सब बदल गया। न बुद्ध अपमानित हुए, न क्रोध पहुँचा। केवल देने वाला खाली हो गया।
बुद्ध इसलिए महान नहीं हैं कि वे उत्तर देते हैं,
वे इसलिए महान हैं कि वे ग्रहण नहीं करते।
जो कुछ तुम लेते हो, वही तुम्हें बाँधता है।
और जो तुम नहीं लेते, वही तुम्हें मुक्त कर देता है।
बुद्ध वहाँ बैठे रहे—
न विजेता, न पराजित—
सिर्फ साक्षी।
भबतु सब्ब मंगलम 🙏
साभार आदरणीय धर्मेन्द्र शाक्य जी ✍️
वरिष्ठ केन्द्रीय सलाहकार
कल्याण मित्र फाउंडेशन भारत