Sonu Verma

Sonu Verma Turning pain into power and silence into strength

जब भी रावी- रागवी की शरारते बताती हूं फेसबुक पर तब कमेंट्स आते हैं अरे कितनी क्यूट है, कितनी प्यारी है, इनको हमें दे दो,...
13/08/2026

जब भी रावी- रागवी की शरारते बताती हूं फेसबुक पर तब कमेंट्स आते हैं अरे कितनी क्यूट है, कितनी प्यारी है, इनको हमें दे दो, हमें नौकरी पर रख लो, अब मेरे दो दिन से इस खोपड़ी में बहुत दर्द है क्यों है पता नहीं कोई पेन किलर कोई चाय कॉफी से आराम नहीं हुआ जो भी रावी-रागवी से बहुत प्यार करते हैं, जिनको वो क्यूट लगती हैं जो बेबी सीटिंग में इंटरेस्टेड है वो प्लीज़ आगे आएँ और अपना थोड़ा-सा प्यार दिखाकर जाएँ। इन्हें रखिये, खिलाइए, इनके साथ खेलिए, इनकी देखभाल कीजिए, सुसु पॉटी साफ़ कीजिए... और अगर इतना सब करने के बाद भी आपके पास थोड़ी-सी एनर्जी और टाइम बच जाए, तो जाते-जाते मेरे इस खोपड़े की थोड़ी-सी मसाज भी कर दीजिए।💆

ये ब्लूबेरीज मैंने Blinkit से ₹528 की मंगवाई थीं। पहली बार रावी-रागवी को खिलाया तो दोनों ने ऐसा मुँह बनाया जैसे मैंने पत...
13/08/2026

ये ब्लूबेरीज मैंने Blinkit से ₹528 की मंगवाई थीं। पहली बार रावी-रागवी को खिलाया तो दोनों ने ऐसा मुँह बनाया जैसे मैंने पता नहीं क्या खिला दिया हो। लेकिन मैंने एक-दो दिन का गैप देकर दोबारा खिलाया, तो इस बार दोनों ने आराम से खा लिया। उसके बाद से जब भी देती हूँ, बड़े चाव से खाती हैं। बल्कि मैं ही इनको लिमिट में देती हूँ, वरना मैडम लोग रुकने का नाम ही नहीं लेतीं। इनको इसका टेस्ट पसंद आ गया है। लेकिन मैंने जब टेस्ट किया मुझे ये कुछ खास नहीं लगी या यूँ कहूँ की अच्छी ही नहीं लगी। बच्चों की पसंद के आगे मेरी पसंद की क्या औकात! इसके बॉक्स पर लिखा है कि ब्लूबेरीज में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, इम्यूनिटी और ब्रेन हेल्थ को सपोर्ट करती हैं, एंटी-एजिंग गुण होते हैं और urinary tract health के लिए भी अच्छी मानी जाती हैं। इसलिए बच्चों की डाइट में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में शामिल करना मुझे अच्छा लगा। हाँ, एक बात जरूर—अगर आप भी ब्लूबेरीज मंगाने की सोच रहे हैं तो ये वाला ब्रांड मत मंगाना क्योंकि इसकी ब्लूबेरीज का साइज काफी छोटा था। अगली बार किसी दूसरे ब्रांड की ट्राय करूँगी। ये frozen blueberries थीं।🫐

आज रावी-रागवी को अकेले संभालते संभालते मैं शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से थक गई। दिनभर का सारा काम किया—दोनों को नहलान...
12/08/2026

आज रावी-रागवी को अकेले संभालते संभालते मैं शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से थक गई। दिनभर का सारा काम किया—दोनों को नहलाना-धुलाना, इनका खाना बनाना, बॉटल क्लीनिंग, फर्स्ट नैप फिर इन्हीं के छूट पुट काम... सब कुछ किया। 3:30 पर इनको सुलाते सुलाते खुद को नींद आने लगी और उठने की हिम्मत ही ना हुई जबकि भूख बहुत तेज लगी हुई थी। इतनी भी ताकत नहीं बची कि उठकर खाना खा लूँ। नींद भी नहीं आई, बस लगभग आधे घंटे तक वैसे ही लेटी रही। घर पर अकेले कभी-कभी दिमाग में इतना गुस्सा और इतनी थकान जमा हो जाती है कि समझ ही नहीं आता कि खुद को कैसे संभालूँ।

फिर रावी-रागवी के उठने के बाद इनसे थोड़ा खेली, हँसी-मज़ाक किया, थोड़ी शरारत की... और कुछ देर बाद मन थोड़ा हल्का लगने लगा। शारीरिक थकान तो इससे दूर नहीं हुई, लेकिन जो मानसिक बोझ था, वो थोड़ा कम ज़रूर हो गया। बच्चों के साथ बिताया हुआ समय हमेशा हमें आराम नहीं देता, लेकिन कई बार मन को संभाल जरूर लेता है।

आज बस मन कर रहा है कि आँखें बंद करूँ, बिल्कुल चुपचाप लेटी रहूँ, थोड़ा मेडिटेशन करूँ और अपने दिमाग की इस भागती-दौड़ती दुनिया से कहीं बहुत दूर चली जाऊँ... ऐसी जगह, जहाँ कुछ देर के लिए कोई जिम्मेदारी न हो, कोई काम न हो, कोई शोर न हो। बस मैं हूँ और थोड़ी-सी शांति। ❤️

हरियाणा में पंचायतें अब लड़कियों के मोबाइल बंद करवाने और प्रेम विवाह पर रोक लगाने के लिए बैठ रही हैं। वाह! 😑दहेज में मार...
12/08/2026

हरियाणा में पंचायतें अब लड़कियों के मोबाइल बंद करवाने और प्रेम विवाह पर रोक लगाने के लिए बैठ रही हैं। वाह! 😑

दहेज में मारी गई बेटी पर पंचायत नहीं हुई, छेड़ी गई बेटी पर पंचायत नहीं हुई। गली के नुक्कड़ पर ताश खेलते उन बुज़ुर्गों की टोलियों पर पंचायत नहीं हुई, जो दिनभर आने-जाने वाली बेटियों को घूरते हैं। उस आदमी पर पंचायत नहीं हुई जो शराब पीकर घर जाकर अपनी पत्नी को पीटता है।

लेकिन लड़की के हाथ में मोबाइल दिख गया, लड़की ने अपनी पसंद के कपड़े पहन लिए, लड़की ने अपनी पसंद से शादी कर ली—बस पंचायत बैठ गई!

किस बात का डर है आखिर? लड़की मोबाइल रखेगी तो समाज बिगड़ जाएगा, लेकिन लड़की को घूरने वाला आदमी समाज नहीं बिगाड़ता? लड़की अपनी पसंद से शादी कर ले तो इज़्ज़त चली जाती है, लेकिन दहेज के लिए लड़की को मार देना इज़्ज़त का सवाल नहीं है? तुम लड़की खरीद कर ले आते हो अपनी निकम्मी औलाद के लिए अपना वंश बढ़ाने के लिए जिंदगी भर उस से गोबर उठवाते हो तब तुम्हारी इज्जत नहीं घटती।

ये सोच मोस्टली न्यू जेनरेशन के लड़कों की तो नहीं है ये सोच है 60s के बूढ़ो की जिनसे खुद तो अपनी जिंदगी में कुछ हुआ नहीं जो खुद एक एक बोतल के लिए वोट बेच देते थे और आये है लड़कियों के राइट्स के ऊपर पंचायत बैठाने। ये खुद दिन में दो दो बंडल बीड़ी पी जाते हैं, गली में बैठ कर ताश खेलेंगे आती जाती बहु बेटियों को देखेंगे शाम को बोतल खोल कर बैठ जाएंगे फिर घरवाली को गा ली देकर बोलेंगे और अपना जोर दिखायेंगे बेटियों की आज़ादी छीनकर । बेटियों की आजादी छीनकर समाज सुरक्षित नहीं होता तुम्हारा डर सुरक्षित हो जाता है। तुमने पहले बेटियां पेट में मारी अब मार नहीं सकते तो जीते जी मार दोगे। क्राइम रेट में हरियाणा ने अच्छी खासी बाजी मार रखी हैं दहेज केसेज में भी उन पर नहीं नज़र गई तुम्हारी रे प केसेज पर नहीं गई।

और 60 साल के बुज़ुर्गों की पंचायत अगर इतनी ही सक्रिय है तो पहले उन मुद्दों पर पंचायत बैठाइए जिनसे बेटियों की ज़िंदगी सच में बर्बाद होती है। ... तुम तुम्हारी जिंदगी जी चुके हो और हम देख चुके है तुम्हारा महान योगदान राम राज्य बनाने में। बढ़िया यही होगा कि अपना बुढ़ापा काटो और जाओ और सबको अपनी जिंदगी जीने दो आज की बेटी पढ़ना चाहती है बढ़ना चाहती है।

यही असली सुधार है। बाकी लड़कियों की आज़ादी छीनना सिर्फ़ पुरानी सोच को नए ज़माने में ढोना है।

अगर आपको एक अच्छी भाभी चाहिए, तो पहले आप एक अच्छी ननद बनिए। अगर आपको एक अच्छी बहू चाहिए, तो पहले एक अच्छी सास बनिए। अगर ...
11/08/2026

अगर आपको एक अच्छी भाभी चाहिए, तो पहले आप एक अच्छी ननद बनिए। अगर आपको एक अच्छी बहू चाहिए, तो पहले एक अच्छी सास बनिए। अगर आपको अच्छी देवरानी चाहिए, तो पहले एक अच्छी जेठानी बनिए। रिश्ते हमेशा एकतरफ़ा उम्मीदों से नहीं चलते। आप सामने वाले से जिस व्यवहार की उम्मीद रखते हैं, उसकी शुरुआत खुद से करनी पड़ती है। लेकिन अगर आप अपनी तरफ़ से अच्छे बनने की पूरी कोशिश कर चुके हैं और फिर भी सामने वाले से आपको वही सम्मान, अपनापन और अच्छा व्यवहार नहीं मिल रहा, तो फिर ज़रूरत से ज़्यादा अच्छे बनने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। हर रिश्ते में अपनी इज़्ज़त, अपनी सीमाएँ और अपना आत्मसम्मान भी ज़रूरी है। अच्छे बनिए, लेकिन इतने भी नहीं कि लोग आपकी अच्छाई को आपकी कमजोरी समझने लगें। ❤️

इस फोटो में जो आप जुड़वा बच्चे और उनके साथ एक औरत को देख रहे हैं, ये इन बच्चों की माँ नहीं हैं और न ही इसका इन बच्चों से ...
09/08/2026

इस फोटो में जो आप जुड़वा बच्चे और उनके साथ एक औरत को देख रहे हैं, ये इन बच्चों की माँ नहीं हैं और न ही इसका इन बच्चों से कोई खून का रिश्ता है। ये मेरी एक फ्रेंड हैं और ये बच्चे मेरी दूसरी फ्रेंड के हैं। लेकिन रिश्ते हमेशा खून से ही बनें, ऐसा ज़रूरी नहीं होता। कुछ रिश्ते इंसान अपने व्यवहार और अपनेपन से बना लेता है।
ऐसे रिश्तों को दिल के रिश्ते कहते हैं।

मेरी ये फ्रेंड मेरी दूसरी फ्रेंड के बच्चों की देखभाल में उसकी बहुत मदद करती हैं। घर के कामों में हाथ बँटाती हैं, बच्चों को संभालती हैं और जब बच्चों के पापा काम के सिलसिले में दो-दो दिन के लिए बाहर चले जाते हैं, तब ये बिना किसी मतलब के उन बच्चों की जिम्मेदारी अपने बच्चों की तरह संभालती हैं इनका खिलाना-पिलाना, सुलाना, सुसु-पॉटी, पार्क ले जाना सब करवाती है जबकि इसकी खुद की भी 3 साल की बेटी है।

मुझे लगता है, किसी के मुश्किल समय में उसके काम आ जाना ही सच्ची दोस्ती है। क्योंकि दोस्ती सिर्फ़ साथ बैठकर हँसने और घूमने का नाम नहीं है... दोस्ती तो तब पता चलती है, जब सामने वाले को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो और आप बिना किसी स्वार्थ के उसके साथ खड़े हों। ❤️

किसी ने सही कहा है, गरीब अपनी आदत से और अमीर अपनी आदत से अमीर होता है। क्योंकि गरीब के घर कोई अमीर आ जाए, तो गरीब दिल-जा...
09/08/2026

किसी ने सही कहा है, गरीब अपनी आदत से और अमीर अपनी आदत से अमीर होता है। क्योंकि गरीब के घर कोई अमीर आ जाए, तो गरीब दिल-जान से उसकी आवभगत करने में जुट जाता है। अच्छे-अच्छे पकवान बनाने की सोचता है, बढ़िया चाय-नाश्ता करवाता है, बार-बार पूछता है कि कुछ और चाहिए तो नहीं, कहाँ बैठाएँ, क्या खिलाएँ... मतलब सामने वाले को किसी चीज़ की कमी महसूस न हो, इसका पूरा ध्यान रखता है। लेकिन अमीर के घर अगर कोई गरीब चला जाए, तो कई बार उसे कोई खास फर्क ही नहीं पड़ता। शायद पानी तक न पूछे या बस चाय दे दी और बात खत्म। अब मैं खुद को ही उदाहरण मान लूँ... मैं भी एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती हूँ। मेरे घर जब कोई आने वाले हो तो मेरा दिमाग तुरंत चलने लगता है कि क्या बना दूँ, क्या खिलाऊँ, कहाँ बैठाऊँ, चाय के साथ क्या दूँ, खाना खिलाऊँ या कुछ और बनाऊं जो चाय ना पीता हो उसके लिए क्या बनाऊं। इसे मेरा एक शौक ही कह लीजिए मुझे बहुत पसंद है किसी की अच्छे से आव भगत करना बढ़िया बढ़िया पकवान बनाना। कई बार बजट से बाहर खर्च भी हो जाता है। लेकिन फिर भी गरीब या कम साधन वाला इंसान अपनी ये आदत चाहकर भी आसानी से नहीं छोड़ पाता। क्योंकि गरीब पैसों से गरीब हो सकता है, लेकिन दिल से अमीर होता है। शायद यही वजह है कि गरीब अपनी खुशियाँ बाँटते-बाँटते खर्च करता रहता है और अमीर बचाते-बचाते और जोड़ता जाता है। और फिर यही आदतें धीरे-धीरे फर्क पैदा करती हैं—गरीब गरीब ही होता जाता है और अमीर अमीर ही बनता जाता है। गरीब के पास पैसा आते ही गरीब सुख सुविधा पर खर्च करेगा या फिर अपने शौक पूरे करेगा लेकिन वंही अमीर के पास पैसा आने पर अमीर उस पैसे से पैसा बनाएगा ।❤️

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