29/10/2022
कानपुर। कानपुर अपने अतीत में कई इतिहास को संजाए हुए है। कानपुर की ऐतिहासिक विरासतें आज भी विद्यमान हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत में सर्वाधिक घंटाघर कानपुर में हैं। इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है। तो आइए जानते हैं क्या है कानपुर के घंटाघर की कहानी।
कभी कानपुर को उत्तर भारत का मेनचेस्टर कहा जाता था। यहां मीलों के सायरन और हजारों की तादात में मजदूरों का मिलों में काम करना था। स्वाधीनता से पहले अंग्रेजों के शासन वाले दौर में जब घड़ी रखना-खरीदना हर किसी की सामर्थ्य में नहीं था, तब मिलों और मजदूरों के इस शहर में समय जानने के लिए सात घंटाघर बनाए गए। इन्हीं में एक कलक्टरगंज चौराहे पर स्थापित हुआ, जिसे बाद में घंटाघर चौराहा कहा जाने लगा। इन घंटाघरों से निकलने वाली टन-टन की गूंज पर ही तब शहर में हर कोई जागता, भागता, दौड़ता और काम करता था। पढ़ि
दो लाख की लागत से बना कानपुर का पहला घंटाघर
अंग्रेज शासनकाल में लाल इमली मिल की स्थापना वर्ष 1876 में जार्ज एलन, वीई कूपर, गैविन एस जोन्स, डा. कोंडोन और बिवैन पेटमैन आदि ने मिलकर की थी। पहले यह मिल ब्रिटिश सेना के सिपाहियों के लिए कंबल बनाने का काम करती थी। तब इसका नाम कानपोर वुलन मिल्स था। बाद में मिल परिसर में लाल इमली के पेड़ होने की वजह से इसका नाम लाल इमली पड़ा। प्रबंधक गैविन एस जोन्स ने मिल के पूर्वी कोने पर ऊंची मीनार बनवाकर वर्ष 1880 में घड़ी लगवाई थी, जिसकी सुइयां इंग्लैंड से आयात की गई थीं। शहर का यह पहला ‘क्लाक टावर’ लगभग दो लाख रुपये में बना था। छह महीने में बनकर तैयार हुए इस टावर को देखने दूर-दूर से लोग आते थे
केईएम में लगा दूसरा घंटाघर
शहर में धीरे-धीरे मिलों और मजदूरों की संख्या बढ़ी। लाल इमली मिल में निर्मित टावर की आवाज दूर तक सुनने में परेशानी हुई। इस पर अंग्रेज अधिकारियों के सामने मजदूरों व मिल प्रबंधकों ने बात रखी। तय हुआ कि दूसरा टावर ऐसी जगह बनाया जाए, जहां से मोहल्लों तक भी आवाज पहुंच सके। इस पर फूलबाग स्थित किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हाल में दूसरा टावर स्थापित किया गया। इसका निर्माण वर्ष 1911 में अंग्रेज अधिकारी बिलक्रिस्ट ने 30 हजार रुपये का सहयोग देकर कराया था। 11 जून, 1912 को जैमन कोबोल ने इस घंटाघर का शुभारंभ किया था।
कोतवाली भवन में बना तीसरा घंटाघर
लाल इमली और फूलबाग के क्लाक टावरों के शुरू होने से आसपास के तमाम मोहल्लों व मिलों के मजदूरों को मदद मिलने लगी। इतिहासकार बताते हैं, इसके बाद तीसरा टावर कानपुर कोतवाली के भवन में स्थापित किया गया, क्योंकि उस समय तक इधर भी आबादी तेजी से बढ़ी।
बिजली घर में स्थापित हुआ चौथा घंटाघर
दूसरा टावर बनने के 13 साल बाद जनरल राबर्ट विंट ने टावर निर्माण के लिए बिजलीघर के भवन को चुना, लेकिन कुछ अधिकारियों ने विरोध कर दिया। इस पर वहां का निर्माण टालकर 1925 में कोतवाली का क्लाक टावर बनाया गया। 17 जुलाई, 1929 को इसका शुभारंभ कर दिया गया।
कमला टावर में बना 5वां घंटाघर
फीलखाना स्थित शहर के पांचवें घंटाघर का निर्माण किसी अंग्रेज ने नहीं, बल्कि भारतीय उद्यमी समूह ने कराया था। यह दिलचस्प इतिहास अब भी कमला टावर के रूप में मौजूद है। वर्ष 1934 में जेके उद्योग समूह के मालिक लाला कमलापत सिंहानिया ने अपने समूह के मुख्यालय पर इस टावर का निर्माण कराया था। कमलापत सिंहानिया ने इस टावर की घड़ी को मात्र एक दिन की कमाई से ही स्थापित करा दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर में एक भारतीय की ओर से घंटाघर का निर्माण कराया जाना ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह जैसा था। इसको लेकर चर्चा भी हुई।
कुतुबमीनार की तरह बना कलक्टरगंज का 6वां घंटाघर
तब के कलक्टरगंज और घंटाघर निर्मित होने के बाद इसी नाम से पहचाना जा रहा घंटाघर चौराहा के टावर की संख्या शहर स्तर पर छठवीं थी। इसके निर्माण की शुरुआत वर्ष 1932 में हुई थी। इसकी बनावट के कारण यह दिल्ली की कुतुब मीनार जैसा दिखता है।इससे पहले निर्मित सभी घंटाघर किसी न किसी भवन में ही बनाए गए, लेकिन यह एकमात्र ऐसा क्लाक टावर है, जो अलग बना हुआ है। इसका निर्माण पांच लाख रुपये की लागत से अंग्रेज जार्ज टी बुम ने कराया था, जो तीन साल बाद 1935 में शुरू हो सका था।
स्वरूप नगर बाजार में बना आखिरी घंटाघर, नहीं लग पाईं सुइयां
जब देश की स्वाधीनता को लेकर वीर बलिदानी अंग्रेजों के विरुद्ध तनकर खड़े थे। आंदोलन की धार तेज ही होती जा रही थी। उसी दौरान स्वरूप नगर बाजार में शहर के सातवें और अंतिम घंटाघर का निर्माण वर्ष 1946 में शुरू हुआ। इस टावर में घड़ी तो बन गई, लेकिन सुइयां नहीं लग पाईं। इसकी वजह आजादी की लड़ाई के दौरान कई बार इसका काम रुकना रहा। इसका निर्माण लार्ड विलियम ने कराया था।
कानपुर में कब कहां बने घंटाघर
1880- लालइमली
1912 -केईएम हाल फूलबाग
1929 -कानपुर कोतवाली
1931 -कानपुर इलेक्ट्रिसिटी कारपोरेशन की इमारत बिजलीघर
1932- कलक्टरगंज चौराहा (अब घंटाघर)
1934 -जेके उद्योग समूह
1946-स्वरूप नगर बाजार