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पहले कोरोना ने साँसें छीनी...फिर अतिक्रमण हटाने के नाम पर रोज़ी-रोटी छीन ली गई...  #कोटपूतली के व्यापारियों को जीते-जी म...
26/02/2026

पहले कोरोना ने साँसें छीनी...

फिर अतिक्रमण हटाने के नाम पर रोज़ी-रोटी छीन ली गई... #कोटपूतली के व्यापारियों को जीते-जी मरा हुआ बना दिया गया।

कुछ साल पहले शहर से अतिक्रमण हटाया गया, दुकानें टूटीं, सपने टूटे, परिवार टूटे... कई #व्यापारी कर्ज में डूबे, कई फिर कभी खड़े ही नहीं हो पाए।

फिर भी शायद "मन" नहीं भरा... अब 75 मीटर के दायरे में होटल, ढाबा, अस्पताल, कारखाने सबके ऊपर आदेश की नंगी तलवार लटक रही है।

विकास की सड़क बनेगी...

पर क्या उस #सड़क की नींव किसी की बरबादी पर रखी जाएगी? क्या यह सही फैसला है...

या फिर एक और "विकास" के नाम पर विनाश? सोचिए...

क्योंकि ईंटें और पत्थर तो फिर जुड़ जाते हैं, लेकिन टूटा हुआ विश्वास और उजड़ा हुआ घर इतनी आसानी से नहीं बसता...

अगर आम जनता ये सोच रही है कि हमारा कोई नुकसान नहीं है हमारा मकान दुकान प्लॉट तो बच गया तो गलत सोच रहे है इन हाईवे पे बने होटल ढाबों हॉस्पिटल कारखानों में आम जनता ही काम करती है चाहे मिस्त्री हो लेबर हो मजदूर हो पेंटर हो हलवाई हो सफाई कर्मचारी पंचर वाला हो ये सब है जिनकी जीविका चलती है हाईवे से..

"इस हिसाब से तो लगान फिल्म के अंग्रेज सही थे जो टैक्स देने वालों के घर जमीन व्यवसाय ओर फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते थे"

पिछली सरकार ने बाजार तोड़ा ये सरकार भी कसर नहीं छोड़ रही ओर लोग राजनीतिक पार्टियों के लिए आपस में बैर मोल ले लेते है आपसी भाईचारा तोड़ लेते है ओर मिलता क्या है...

22/12/2025
08/11/2025

13/08/2025

मैं पैदल वापस घर आ रहा था। रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था। पास जाकर देखा, लिखा थाः कृपया पढ़ें " इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं।" यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई। पता याद रखा। यह उस गली के आखिरी में एक झुग्गी झोपड़ी का है। वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई। मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है। उसे ठीक से दिखाई नहीं देता । "माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है। उसे देने आया हूँ।" यह सुन वह वृद्धा रोने लगी । बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं। मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, । ठीक से दिखाई नहीं देता । पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है।" बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए। पर एक विनती की बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा । जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।' मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा। किसी ने भी नहीं फाड़ा । मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया। जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा । सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं, पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई। और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं।

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