Neeta Rani Sharma

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*☘️पितृ विसर्जनी अमावस्या☘️*  *10 अक्टूबर 2026, शनिवार* पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पितृ वि...
09/10/2026

*☘️पितृ विसर्जनी अमावस्या☘️*
*10 अक्टूबर 2026, शनिवार*

पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पितृ विसर्जनी अमावस्या कहा जाता है। इस बार *पितृ विसर्जनी अमावस्या 10 अक्टूबर 2026, शनिवार* को रहेगी।

इस दिन श्राद्ध पक्ष का समापन होता है और शास्त्र मान्यताओं के अनुसार पितृ लोक से आए हुए पितृजन अपने लोक वापस लौट जाते हैं। इस दिन गौ सेवा व योग्य ब्राह्मण सेवा तथा दान- पुण्य- जप इत्यादि करने से पितृजन तृप्त होते हैं और लौटते समय अपने पुत्र, पौत्रों और परिवार को आशीर्वाद देकर जाते हैं।

*🌘आश्विन अमावस्या धार्मिक कर्म-:*

● आश्विन अमावस्या के दिन पितृ पक्ष समाप्त होते हैं इसलिए इस दिन पितरों का पूजन- जलांजलि- तर्पण इत्यादि का विशेष महत्व//

● इस दिन पवित्र नदी, जलाशय आदि में स्नान करना या तो घर पर बाल्टी में गंगाजल की कुछ बूंदें डालकर स्नान करना चाहिए और उसके उपरांत सूर्य देव को अर्घ्य देना, पितरों के निमित्त तर्पण इत्यादि करना चाहिए//

● शास्त्रों में इस दिन पितरों के निमित्त श्रीगीता जी के पाठ / गीता का सातवां अध्याय पढ़ना और भगवान से पितरों की मुक्ति की प्रार्थना करना बताया गया है//

● इस दिन पितरों के निमित्त मंत्र जप व नाम जप इत्यादि करना शास्त्रों में बताया गया है//

● इस दिन संध्या के समय देवालय- शिवालय, घर के परिंडे व दक्षिण दिशा के किसी साफ स्थान पर दीपक जलाएं। शास्त्र मान्यताओं के अनुसार दीपक की रोशनी में पितरों को जाने का रास्ता दिखाया जाता है//

● यदि किसी वजह से आपको अपने पितृों के श्राद्ध की तिथि याद न हो तो, इस दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है//

● इसके अलावा यदि आप पूरे श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण नहीं कर पाये हैं तो, इस दिन पितरों का तर्पण कर सकते हैं//

● इस दिन भूले-भटके पितरों के नाम से गौ सेवा करना और किसी योग्य ब्राह्मण को दान दक्षिणा देना भी शास्त्रों में बताया है//

● आश्विन अमावस्या का महत्व ज्ञात और अज्ञात पितृों के पूजन के लिए आश्विन अमावस्या का बड़ा महत्व है, इसलिए इसे सर्व पितृजनी अमावस्या और महालय विसर्जन भी कहा जाता है। इस अमावस्या का श्राद्धकर्म के लिए बहुत महत्व है//

● शास्त्र कहते हैं कि पितृ काल में कुछ शुभ व पवित्र कर्म (कार्य) करने के शुभ संकल्प लेने चाहिए। जिसका पुण्य हमारे पितरों को मिल सके और पितरों का आशीर्वाद हमें प्राप्त हो सके//

● ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में पितृ दोष इत्यादि विद्यमान है तो अमावस्या के दिन मंत्र जाप का संकल्प लेना चाहिए और नित्य प्रति एक माला पितरों के निमित्त करनी चाहिए//
*ॐ सर्व पितृ देवाय नमः*

09/10/2026

🥰👉 शुभ रात्रि मेरे प्यारे दोस्तों आइये
भोलेनाथ के इस भजन के साथ
नृत्य करते हुए आज के दिन का
समापन करते हैं 👈🥰

🥰🙏मेरे प्यारे स्टार सेंडर्स के नाम 🙏🥰❤️🎂🎁 मेरे जन्मदिन को यादगार बनाने वाले मेरे सभी प्यारे स्टार सेंडर्स को दिल की गहरा...
08/10/2026

🥰🙏मेरे प्यारे स्टार सेंडर्स के नाम 🙏🥰❤️
🎂🎁 मेरे जन्मदिन को यादगार बनाने वाले मेरे सभी प्यारे स्टार सेंडर्स को दिल की गहराइयों से धन्यवाद! ❤️🌟
आप सभी ने मुझे ढेर सारे स्टार्स भेजकर जो प्यार और सम्मान दिया है, उसने मेरा दिल खुशियों से भर दिया। 🥰💖 आपके ये स्टार्स मेरे लिए सिर्फ गिफ्ट नहीं, बल्कि आपका अनमोल प्यार हैं। ❤️🙏
आप सभी का प्यार ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है! ऐसे ही अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखिएगा। आप सभी को दिल से ढेर सारा प्यार!
🫶😘

*🍃प्रयास ही सफल बनाते हैं🍃* कभी समुद्र के किनारे बैठकर लहरों से कुछ सीखिए~~~~~इसलिए नहीं कि वे उठती हैं और फिर गिर जाती ...
08/10/2026

*🍃प्रयास ही सफल बनाते हैं🍃*

कभी समुद्र के किनारे बैठकर लहरों से कुछ सीखिए~~~~~

इसलिए नहीं कि वे उठती हैं और फिर गिर जाती हैं
बल्कि इसलिए कि वे जब भी गिरती हैं, नए जोश के साथ फिर उठ जाती हैं।
लहरों को देखकर कभी ऐसा नहीं लगता कि उनका गिरना उनकी हार है.

वे किनारे तक आती हैं अपनी पूरी शक्ति से उठती हैं फिर टूटकर लौट जाती हैं…
लेकिन अगली ही क्षण उसी समुद्र की गहराई से
एक नई लहर जन्म लेती है.

न कोई शिकायत,न कोई पछतावा,न यह प्रश्न कि
“मैं पहले क्यों गिर गई?”
बस फिर उठना है…
शायद जीवन भी हमसे यही कहता है.

हर ऊँचाई के बाद गिरावट आ सकती है.
हर सफलता के बाद कठिन समय आ सकता है.
हर प्रयास का परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं हो सकता. लेकिन गिर जाना जीवन की हार नहीं है गिरकर उठने से इंकार कर देना हार है.

कभी हम असफल होते हैं,कभी अपने ही निर्णयों से निराश होते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारी सारी योजनाएँ बदल देती हैं. कभी लगता है कि जितना बनाया था, सब एक क्षण में बिखर गया.

ऐसे समय में लहरों को याद कीजिए.

वे हमें सिखाती हैं कि समुद्र की गहराई में शक्ति बची हो, तो एक गिरावट अंतिम नहीं होती.
जीवन में भी हमें अपनी शक्ति बाहर नहीं,
कई बार अपने भीतर तलाशनी पड़ती है।

कल जो नहीं हो पाया, उसका शोक आज को मत सौंपिए. जो छूट गया, उससे सीखिए.
जो टूट गया, उससे स्वयं को पहचानिए.
और जहाँ से रास्ता समाप्त दिखाई दे,
वहीं से एक नया रास्ता बनाने का साहस कीजिए.

क्योंकि जीवन में सफलता का अर्थ यह नहीं कि
मनुष्य कभी गिरे ही नहीं.
सफलता तो शायद यह है कि हर गिरावट के बाद उसके भीतर उठने की इच्छा जीवित रहे.

लहरें किनारे से टकराकर लौटती हैं लेकिन समुद्र से अपना संबंध नहीं तोड़तीं.
हम भी परिस्थितियों से टकराकर कुछ समय के लिए पीछे हट सकते हैं, रुक सकते हैं,
अपने घावों को भरने का समय ले सकते हैं…
लेकिन अपने उद्देश्य से संबंध मत तोड़िए.

थकना स्वाभाविक है. रुकना भी कभी-कभी आवश्यक है. आँसू आ जाना भी कमजोरी नहीं.
बस इतना ध्यान रखिए—
ठहराव को अपना स्थायी पता मत बनने दीजिए।

आज यदि जीवन ने आपको गिराया है तो संभव है कल वही अनुभव आपको पहले से अधिक मजबूत बनाकर उठाए। हर चोट अपने साथ कोई न कोई सीख लेकर आती है। हर असफलता अपने भीतर कोई नया रास्ता छिपाए रहती है।
और हर कठिन समय मनुष्य को उसके भीतर छिपी उस शक्ति से परिचित करा सकता है, जिसका उसे पहले पता ही नहीं था।

इसलिए—
जब जीवन की लहरें तेज हों तो उनसे डरिए मत.
उनसे पूछिए— “मुझे क्या सिखाने आई हो?”
और जब स्वयं से यह प्रश्न करने लगेंगे तो शायद परिस्थितियाँ बदलने से पहले आपका दृष्टिकोण बदलने लगेगा.

लहरों का सौंदर्य उनके उठने में ही नहीं उनके
बार-बार उठते रहने में है.
आप भी उठिए, धीरे उठिए तो भी चलेगा.
थोड़ा संभलकर उठिए तो भी चलेगा.
लेकिन उठिए ज़रूर.

क्योंकि—
जो गिरकर फिर उठता है वह केवल अपनी राह पर वापस नहीं आता; वह अपने भीतर की नई शक्ति को भी पहचान लेता है.
और शायद जीवन का सबसे सुंदर सत्य यही है—
लहरों को समुद्र इसलिए महान नहीं बनाता कि वे कभी गिरती नहीं बल्कि इसलिए कि गिरने के बाद भी वे उठना नहीं छोड़तीं.

तो आज यदि जीवन में कोई गिरावट आई है,
तो उसे अंतिम अध्याय मत समझिए.

हो सकता है…
आपकी अगली लहर
पहले से कहीं अधिक ऊँची उठने वाली हो~~~

* *स्वस्थ एवं प्रसन्न रहिए💐*

07/10/2026

🥰💝 भागवत कथा का श्रवण करना
लोगों तक उसे कथा को लाइव करके
दिखाना यह एक बहुत बड़ा पुण्य का
काम है मंदिर का प्रसाद खाना और
खिलाना भी सौभाग्य की बात है 💝🥰
#

07/10/2026

🥰💝 दिन भर की भागदौड़ के बाद आइये अब अपने तन को थोड़ा विश्राम देते हैं और मन को थोड़ा आराम देते हैं 💝🥰
शुभ रात्रि दोस्तो 🌹🌹 राधे राधे कृष्णा जी 🌹

🌹🥰 आटे से बना हुआ शिव परिवार            आपको कैसा लगा, अगर आपको            पसंद आया हो तो इस पोस्ट को लाइक            शे...
06/10/2026

🌹🥰 आटे से बना हुआ शिव परिवार
आपको कैसा लगा, अगर आपको
पसंद आया हो तो इस पोस्ट को लाइक
शेयर, और कमेंट्स जरूर कीजिए 🌹🌹

06/10/2026

Meenaxi Khandelwal

06/10/2026

🌹🥰 भगवान श्री कृष्ण जी के इस
प्यारे भजन के साथ आज के
दिन का समापन करते हैं 🥰🌹

*🚩 जयश्री सीताराम 🚩*     {श्री हनुमान चालीसा}हम सभी हनुमान चालीसा की प्रत्येक चौपाई के माध्यम से केवल शब्दों का अर्थ नही...
06/10/2026

*🚩 जयश्री सीताराम 🚩*
{श्री हनुमान चालीसा}

हम सभी हनुमान चालीसा की प्रत्येक चौपाई के माध्यम से केवल शब्दों का अर्थ नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाले आध्यात्मिक रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। श्रीहनुमानजी केवल बल, पराक्रम और भक्ति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ शरीर, निर्मल मन, उच्च ध्येय और भगवान से अटूट प्रेम के भी सर्वोच्च आदर्श हैं।

शनिवार को हमने चौपाई -:

"भूत पिसाच निकट नहिं आवैं।
महाबीर जब नाम सुनावै॥"

के माध्यम से समझा था कि भगवान पर अटूट विश्वास और हनुमानजी का स्मरण मनुष्य के भीतर से भय को समाप्त कर देता है। वास्तविक भूत-पिशाच केवल बाहरी शक्तियाँ नहीं, बल्कि हमारे भीतर के भय, असुरक्षा, नकारात्मक विचार और विकार भी हैं। जब महावीर हनुमान हमारे जीवन का आधार बनते हैं, तब मन निर्भय और स्थिर हो जाता है/

आज की चौपाई हमें जप की महिमा, मानसिक आरोग्य और जीवन के वास्तविक ध्येय का दिव्य संदेश देती है।

*"नासै रोग हरै सब पीरा ।*
*जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥"*

अर्थ~:
* "हे वीर हनुमानजी! आपका निरंतर स्मरण और जप करने से सभी रोग नष्ट होते हैं तथा सभी प्रकार की पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।"

गूढ़ार्थ~:
* "तुलसीदासजी यहाँ केवल शारीरिक रोगों की बात नहीं कर रहे हैं। वे मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन को स्वस्थ बनाने की बात करते हैं।"

मनुष्य तीन प्रकार की पीड़ाओं से घिरा रहता है—
* रोग, भय और विकार/

रोग शरीर को कष्ट देता है।

भय मन को अशांत करता है।

और विकार आत्मा के प्रकाश को ढक देते हैं।

हनुमानजी का जप इन तीनों से मुक्ति का मार्ग बनता है।

तुलसीदासजी कहते हैं कि केवल शरीर का स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं है।

मानसिक और बौद्धिक आरोग्य भी उतना ही आवश्यक है।

जीवन में दुःख आएँगे, यह निश्चित है।

लेकिन भक्ति का उद्देश्य दुःखों को समाप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य की दृष्टि को इतना ऊँचा बना देना है कि दुःख भी उसे तोड़ न सके।

दुःख का आना और दुःख का लगना—दोनों अलग बातें हैं।

जिसका दृष्टिकोण बदल गया, उसके लिए विपत्ति भी साधना बन जाती है।

प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही मनुष्य की वास्तविक परीक्षा होती हैं।

अनुकूल समय में स्थिर रहना सरल है।

लेकिन विपत्ति में धैर्य, विश्वास और संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक आध्यात्मिक आरोग्य है।

तुलसीदासजी कहते हैं—

भक्ति केवल मंदिर जाकर फूल चढ़ाने का नाम नहीं है।

भक्ति का उद्देश्य भीतर और बाहर दोनों का परिवर्तन है।

सच्ची भक्ति मनुष्य के विचारों को तेजस्वी, बुद्धि को निर्मल और हृदय को प्रेममय बना देती है।

इसीलिए वे कहते हैं—

"जपत निरन्तर हनुमत बीरा।"

यहाँ जप का अर्थ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है।

जप का वास्तविक अर्थ है—

निरंतर स्मरण और चिंतन।

यदि देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य दिन-रात जप ही करता है।

कोई धन का जप करता है।

कोई पद का।

कोई परिवार का।

कोई भविष्य की चिंता का।

प्रश्न यह नहीं कि हम जप करते हैं या नहीं।

प्रश्न यह है कि हम किसका जप करते हैं।

तुलसीदासजी दो अत्यंत गहरे प्रश्न पूछने की प्रेरणा देते हैं~:

इस संसार में मेरा कौन है?

और—

इस संसार में मेरा क्या है?

यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर मिल जाए, तो जीवन की दिशा बदल जाती है।

धन, मित्र, संबंध और प्रतिष्ठा परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं।

लेकिन भगवान कभी साथ नहीं छोड़ते।

जब संसार साथ छोड़ देता है, तब भी राम साथ रहते हैं।

रात्रि के एकांत में, रोग की पीड़ा में, निराशा के क्षणों में—

यदि कोई साथ रहता है, तो वह केवल भगवान का नाम है।

दूसरा प्रश्न है—:

मेरे साथ वास्तव में क्या जाएगा?

न घर।

न धन।

न पद।

न सम्मान।

शास्त्र कहते हैं—

«धन पृथ्वी पर रह जाता है।»

«परिवार घर के द्वार तक साथ आता है।»

«संबंधी श्मशान तक साथ चलते हैं।»

लेकिन आगे केवल हमारे कर्म साथ जाते हैं।

इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं—

यदि कर्म भी भगवान के लिए किए जाएँ, तो वही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाते हैं।

जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न है—

क्या हमारा कोई ध्येय है?

राम, लक्ष्मण, भरत, सीता और हनुमानजी का सम्पूर्ण जीवन किसी उच्च ध्येय के लिए समर्पित था।

जिस मनुष्य के जीवन में कोई महान उद्देश्य नहीं होता, उसका जीवन धीरे-धीरे नीरस हो जाता है।

नाम-जप तभी शक्ति देता है, जब उसके पीछे जीवन का कोई उच्च लक्ष्य हो।

केवल माला फेरना पर्याप्त नहीं।

भगवान पूछते हैं—

"तुम मुझे क्यों पुकार रहे हो?"

यदि उत्तर हो—

"प्रभु! मुझे आपका कार्य करना है, पर मेरी शक्ति कम पड़ रही है।"

तब नाम-जप साधना बन जाता है।

तुलसीदासजी कहते हैं—

जप का उद्देश्य केवल पुण्य कमाना नहीं,

बल्कि अपने भीतर के विकारों को समाप्त करना है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से लड़ने का सबसे सरल उपाय है—

भगवान का नाम।

जहाँ राम का राज्य स्थापित हो जाता है,

वहाँ काम और विकार स्वयं पीछे हटने लगते हैं।

योगसूत्र भी कहता है—
"तज्जपस्तदर्थभावनम्।"

अर्थात- केवल नाम बोलना पर्याप्त नहीं।

उसके अर्थ का चिंतन और भाव भी आवश्यक है।

नाम तभी हृदय को बदलता है, जब उसमें प्रेम जुड़ जाता है।

तुलसीदासजी बताते हैं कि जप भय से नहीं, प्रेम से होना चाहिए।

भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं,

भगवान से प्रेम करने के लिए।

सच्चा जप वही है जिसमें शब्दों से अधिक हृदय बोलता है।

माला हाथ में हो,

लेकिन मन संसार में भटकता रहे,

तो जप अधूरा रह जाता है।

जब मन, बुद्धि और हृदय तीनों भगवान में लग जाएँ,

तभी जप जीवन को बदल देता है।

हमारे संत कहते हैं—

हे प्रभु! आपका रूप भी मधुर है और आपका नाम भी मधुर है।

जप का अंतिम स्वरूप यही है कि भगवान का नाम लेते समय स्वयं भगवान भी उस प्रेम को अनुभव करें।

तुलसीदासजी अंत में यही संदेश देते हैं—

यदि जीवन से रोग, भय, पीड़ा और विकार दूर करने हैं,

यदि मन को स्वस्थ, बुद्धि को निर्मल और हृदय को प्रेममय बनाना है,

तो केवल औपचारिक जप नहीं,

बल्कि भाव, अर्थ और प्रेम से किया गया निरंतर नाम-स्मरण आवश्यक है।

इसीलिए उन्होंने लिखा—
"नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥"

🕉️
*जयश्री सीताराम*

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Bedi House , B IV 752
Moga
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