06/10/2026
*🚩 जयश्री सीताराम 🚩*
{श्री हनुमान चालीसा}
हम सभी हनुमान चालीसा की प्रत्येक चौपाई के माध्यम से केवल शब्दों का अर्थ नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाले आध्यात्मिक रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। श्रीहनुमानजी केवल बल, पराक्रम और भक्ति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ शरीर, निर्मल मन, उच्च ध्येय और भगवान से अटूट प्रेम के भी सर्वोच्च आदर्श हैं।
शनिवार को हमने चौपाई -:
"भूत पिसाच निकट नहिं आवैं।
महाबीर जब नाम सुनावै॥"
के माध्यम से समझा था कि भगवान पर अटूट विश्वास और हनुमानजी का स्मरण मनुष्य के भीतर से भय को समाप्त कर देता है। वास्तविक भूत-पिशाच केवल बाहरी शक्तियाँ नहीं, बल्कि हमारे भीतर के भय, असुरक्षा, नकारात्मक विचार और विकार भी हैं। जब महावीर हनुमान हमारे जीवन का आधार बनते हैं, तब मन निर्भय और स्थिर हो जाता है/
आज की चौपाई हमें जप की महिमा, मानसिक आरोग्य और जीवन के वास्तविक ध्येय का दिव्य संदेश देती है।
*"नासै रोग हरै सब पीरा ।*
*जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥"*
अर्थ~:
* "हे वीर हनुमानजी! आपका निरंतर स्मरण और जप करने से सभी रोग नष्ट होते हैं तथा सभी प्रकार की पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।"
गूढ़ार्थ~:
* "तुलसीदासजी यहाँ केवल शारीरिक रोगों की बात नहीं कर रहे हैं। वे मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन को स्वस्थ बनाने की बात करते हैं।"
मनुष्य तीन प्रकार की पीड़ाओं से घिरा रहता है—
* रोग, भय और विकार/
रोग शरीर को कष्ट देता है।
भय मन को अशांत करता है।
और विकार आत्मा के प्रकाश को ढक देते हैं।
हनुमानजी का जप इन तीनों से मुक्ति का मार्ग बनता है।
तुलसीदासजी कहते हैं कि केवल शरीर का स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं है।
मानसिक और बौद्धिक आरोग्य भी उतना ही आवश्यक है।
जीवन में दुःख आएँगे, यह निश्चित है।
लेकिन भक्ति का उद्देश्य दुःखों को समाप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य की दृष्टि को इतना ऊँचा बना देना है कि दुःख भी उसे तोड़ न सके।
दुःख का आना और दुःख का लगना—दोनों अलग बातें हैं।
जिसका दृष्टिकोण बदल गया, उसके लिए विपत्ति भी साधना बन जाती है।
प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही मनुष्य की वास्तविक परीक्षा होती हैं।
अनुकूल समय में स्थिर रहना सरल है।
लेकिन विपत्ति में धैर्य, विश्वास और संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक आध्यात्मिक आरोग्य है।
तुलसीदासजी कहते हैं—
भक्ति केवल मंदिर जाकर फूल चढ़ाने का नाम नहीं है।
भक्ति का उद्देश्य भीतर और बाहर दोनों का परिवर्तन है।
सच्ची भक्ति मनुष्य के विचारों को तेजस्वी, बुद्धि को निर्मल और हृदय को प्रेममय बना देती है।
इसीलिए वे कहते हैं—
"जपत निरन्तर हनुमत बीरा।"
यहाँ जप का अर्थ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है।
जप का वास्तविक अर्थ है—
निरंतर स्मरण और चिंतन।
यदि देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य दिन-रात जप ही करता है।
कोई धन का जप करता है।
कोई पद का।
कोई परिवार का।
कोई भविष्य की चिंता का।
प्रश्न यह नहीं कि हम जप करते हैं या नहीं।
प्रश्न यह है कि हम किसका जप करते हैं।
तुलसीदासजी दो अत्यंत गहरे प्रश्न पूछने की प्रेरणा देते हैं~:
इस संसार में मेरा कौन है?
और—
इस संसार में मेरा क्या है?
यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर मिल जाए, तो जीवन की दिशा बदल जाती है।
धन, मित्र, संबंध और प्रतिष्ठा परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं।
लेकिन भगवान कभी साथ नहीं छोड़ते।
जब संसार साथ छोड़ देता है, तब भी राम साथ रहते हैं।
रात्रि के एकांत में, रोग की पीड़ा में, निराशा के क्षणों में—
यदि कोई साथ रहता है, तो वह केवल भगवान का नाम है।
दूसरा प्रश्न है—:
मेरे साथ वास्तव में क्या जाएगा?
न घर।
न धन।
न पद।
न सम्मान।
शास्त्र कहते हैं—
«धन पृथ्वी पर रह जाता है।»
«परिवार घर के द्वार तक साथ आता है।»
«संबंधी श्मशान तक साथ चलते हैं।»
लेकिन आगे केवल हमारे कर्म साथ जाते हैं।
इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं—
यदि कर्म भी भगवान के लिए किए जाएँ, तो वही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाते हैं।
जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न है—
क्या हमारा कोई ध्येय है?
राम, लक्ष्मण, भरत, सीता और हनुमानजी का सम्पूर्ण जीवन किसी उच्च ध्येय के लिए समर्पित था।
जिस मनुष्य के जीवन में कोई महान उद्देश्य नहीं होता, उसका जीवन धीरे-धीरे नीरस हो जाता है।
नाम-जप तभी शक्ति देता है, जब उसके पीछे जीवन का कोई उच्च लक्ष्य हो।
केवल माला फेरना पर्याप्त नहीं।
भगवान पूछते हैं—
"तुम मुझे क्यों पुकार रहे हो?"
यदि उत्तर हो—
"प्रभु! मुझे आपका कार्य करना है, पर मेरी शक्ति कम पड़ रही है।"
तब नाम-जप साधना बन जाता है।
तुलसीदासजी कहते हैं—
जप का उद्देश्य केवल पुण्य कमाना नहीं,
बल्कि अपने भीतर के विकारों को समाप्त करना है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से लड़ने का सबसे सरल उपाय है—
भगवान का नाम।
जहाँ राम का राज्य स्थापित हो जाता है,
वहाँ काम और विकार स्वयं पीछे हटने लगते हैं।
योगसूत्र भी कहता है—
"तज्जपस्तदर्थभावनम्।"
अर्थात- केवल नाम बोलना पर्याप्त नहीं।
उसके अर्थ का चिंतन और भाव भी आवश्यक है।
नाम तभी हृदय को बदलता है, जब उसमें प्रेम जुड़ जाता है।
तुलसीदासजी बताते हैं कि जप भय से नहीं, प्रेम से होना चाहिए।
भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं,
भगवान से प्रेम करने के लिए।
सच्चा जप वही है जिसमें शब्दों से अधिक हृदय बोलता है।
माला हाथ में हो,
लेकिन मन संसार में भटकता रहे,
तो जप अधूरा रह जाता है।
जब मन, बुद्धि और हृदय तीनों भगवान में लग जाएँ,
तभी जप जीवन को बदल देता है।
हमारे संत कहते हैं—
हे प्रभु! आपका रूप भी मधुर है और आपका नाम भी मधुर है।
जप का अंतिम स्वरूप यही है कि भगवान का नाम लेते समय स्वयं भगवान भी उस प्रेम को अनुभव करें।
तुलसीदासजी अंत में यही संदेश देते हैं—
यदि जीवन से रोग, भय, पीड़ा और विकार दूर करने हैं,
यदि मन को स्वस्थ, बुद्धि को निर्मल और हृदय को प्रेममय बनाना है,
तो केवल औपचारिक जप नहीं,
बल्कि भाव, अर्थ और प्रेम से किया गया निरंतर नाम-स्मरण आवश्यक है।
इसीलिए उन्होंने लिखा—
"नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥"
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*जयश्री सीताराम*