15/08/2026
ोड़ो_हनुमान_को_बुलाओ! - नौसिखिये किशनाराम बिश्नोई के नेतृत्व में समाज के संघर्ष का सौदा! सत्ता में तानाशाही, विपक्ष में नौसिखियापन—यही है पूर्व विधायक का असली चेहरा।
अपना ईगो और घमंड छोड़िए। अगर हनुमान जी एक पोस्ट भी कर दें कि "मैं लोहावट आ रहा हूं" तो यह पूरा प्रकरण पर्दाफाश हो जाएगा। लेकिन आप द्वेष भावना के कारण उन्हें बुलाना ही नहीं चाहते। 115 लोग आमरण अनशन पर थे, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उनकी भावनाओं का कुचलकर आपने समझौता कर लिया। अब धरने पर बैठकर आप इसे और आगे नहीं बढ़ा पाएंगे।
विश्नोई समाज का बहुत नुकसान हो चुका है। अब भी समय है, Kishna Ram Vishnoi जी! संकट मोचन बनकर बेड़ा पार करने वाले हनुमान जी को याद कर लीजिए, अन्यथा इतिहास आपको सिर्फ एक "नौसिखिये आंदोलनकारी" के रूप में याद रखेगा, जिसने चुनाव के लिए समाज की भावनाओं का सौदा कर दिया।
सबसे बड़ी भूल बॉडी को उठवाना और लिखित आश्वासन के नाम पर 5 दिन का समय देना था। सिस्टम और सरकार केवल तब तक दबाव में रहते हैं जब तक शव उनके पास हो। हजारों लोगों की इस भीड़ के नेतृत्व की आपको समझ ही नहीं थी। अगर ज्ञान होता, तो हजारों की भीड़ के साथ सीधा फलोदी एसपी/कलेक्टर कार्यालय कूच किया जाता,या उससे भी बेहतर, जोधपुर संभागीय आयुक्त/पुलिस आईजी कार्यालय का घेराव होता। आधे रास्ते में ही सारे काम हो सकते थे, लेकिन आपने समाज का इतना बड़ा संघर्ष गंवा दिया।
यह कोई पहला मौका नहीं है। एसएमएस हॉस्पिटल में डॉ. राकेश बिश्नोई सुसाइड का मामला हो,या बीकानेर का खेजड़ी आंदोलन—आप कहीं नज़र नहीं आए, एक पोस्ट तक नहीं की। अब भंवरी देवी बिश्नोई के केस में आंदोलन सिर्फ इसलिए क्योंकि पंचायती राज चुनाव सिर पर हैं? क्या न्याय सिर्फ तब चाहिए जब जिला प्रमुख की कुर्सी या बेटे का भविष्य दांव पर लगा हो? अगर चुनाव नहीं होते, तो आप इसे भी दिवंगत प्रियंका बिश्नोई की तरह इग्नोर ही करते।
आज 9 दिनों की भूख हड़ताल का इस तरह अचानक समाप्त होना और कांग्रेस की टोपी पहनकर ध्वजारोहण करना—इन सब तस्वीरों ने जनता के सामने सब कुछ साफ कर दिया है। लोगों को अब समझ आ गया है कि यह सब सिर्फ राजनीतिक ड्रामेबाजी के अलावा कुछ नहीं था। जब आप पिछले 5 साल सत्ता में थे, तब कार्यकर्ताओं द्वारा आपके खिलाफ एक छोटा सा कमेंट करने पर भी पुलिस की गाड़ी भेजकर गिरफ्तार करवा देते थे। तब आपकी ताकत का रौब अलग ही था।
आज भूख हड़ताल खत्म करके आपने समाज के 115 लोगों के उस ऐतिहासिक अनशन और हजारों लोगों की भावनाओं की बलि चढ़ा दी। जनता सब जान चुकी है कि किस तरह समझौतों की पोटलियां खुली हैं और आपके सारे पर्दे फाश हो चुके हैं। जिंदगी में कभी कोई बड़ा आंदोलन किया नहीं, यह आपका पहला अनुभव था और इसमें आपको आंदोलन का रत्तीभर भी नॉलेज नहीं था। न रणनीति, न नेतृत्व की समझ—बस टेंट के अंदर बैठकर फैसले होते रहे।
आज आपके समाज के नेता ही धरना स्थल पर कह रहे थे कि यह मामला अब खुलेगा नहीं क्योंकि "सेटल" हो चुका है। यदि आप वाकई ईमानदार हैं, तो इस 'सेटल' की गांठ खोलने वाला राजस्थान में अब एक ही शख्स है Rashtriya Loktantrik Party सुप्रीमो श्री Hanuman Beniwal जी को याद कीजिए, वरना इतिहास आपको केवल एक असफल और स्वार्थी 'नौसिखिये आंदोलनकारी' के रूप में याद रखेगा, जिसने चुनाव के लालच में समाज के संघर्ष को बेच दिया।