12/08/2026
श्री सद्गुरु के धाम को पवित्र मानने की भावना भारतीय संत-परंपरा में बहुत गहरी है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:
सद्गुरु का धाम साधना और सत्संग का केंद्र होता है—जहाँ नाम-स्मरण, भजन, ध्यान और सद्विचार का वातावरण रहता है।
शास्त्रों में गुरु को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। गुरुगीता में गुरु को अज्ञान का अंधकार दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला बताया गया है।
तीर्थ का उद्देश्य अंतःकरण की शुद्धि है। संतमत की दृष्टि से जहाँ सद्गुरु की वाणी, साधना और सत्संग से मनुष्य का मन ईश्वर की ओर मुड़ता है, वह स्थान तीर्थ के समान माना जाता है।
इसलिए सद्गुरु के धाम की महिमा केवल भवन या भूमि के कारण नहीं, बल्कि वहाँ होने वाली साधना, सत्संग, सेवा और गुरु-स्मरण के कारण मानी जाती है।
एक सुंदर भाव:
“जहाँ सद्गुरु की चरण-रज, संतों की संगति और प्रभु-नाम का स्मरण हो, वहाँ की भूमि साधक के लिए तीर्थ बन जाती है।”